सोमवार, दिसंबर 6

ये ट्रेन टू सहारनपुर-मन की पटरियो पर दौड़ती एक्सप्रेस

सर्जना शर्मा
सहारनपुर से लौटते समय जब मैं शाम को देहरादून शताब्दी में चढ़ी तो देखा-- मेरी आरक्षित सीट पर एक भद्र महिला अपने लैपटॉप पर काम कर रही थी । पतली दुबली कॉटन की साड़ी पहने हुए चश्मा लगाए हुए देखने में काफी संभ्रात और सुशिक्षित लग रही थीं . मैने अपना टिकट निकाल कर फिर से अपना सीट नंबर देखा ।
नंबर तो ठीक है, फिर मैने उनसे पूछा-- आपका सीट नंबर क्या है।
 उन्होनें सधे लहजे में अंग्रेजी में जवाब दिया -- यू आर राईट टिस इज़ योर सीट इफ यू वांट मी टू गेट अप आई  विल गो टू माई सीट ।
मैने उनसे कहा कि मुझे कोई प्रॉबलम नहीं है आप इसी सीट पर बैठी रहिए ।
वो थोड़ा आश्वस्त हुई और फिर से अपने लैप टॉप पर बिज़ी हो गयीं । मैंने उने साथ वाली सीट ले ली और अपना बैद उपर रखने से पहले उसमें से संतोष देसाई की किताब निकाल ली । जिसे मैं रास्ते में पढ़ कर खत्म कर देना चाहती थी ।
 थोड़ी देर बाद वो अपनी सीट से उठीं और पीछे की सीट पर बैठे युवक को इंटनेट का पलग इन वापस किया और शिकायत भरे लहजे में बोलने लगी-- यहां कुछ भी  काम नहीं करता , यहां सब कुछ है लेकिन कुछ नहीं चलता वहां ऐसा नहीं है वहां सब कुछ ठीक से चलता है मशीने भी और आदमी भी । मैनें उनके लैपटॉप पर पढ़ लिया था कि वो अमेरिका की रहने वाली हैं और मैं समझ रही थी कि वो भारत को कोस रही है । यहां की व्यवस्था  को कोस रही हैं ।
मैं बहुत देर तक उनकी बात सुनती रही मुझसे नहीं रहा गया तो मैने उनसे कहा इतना भी बुरा नहीं है भारत यहां सब कुछ है अब आप ट्रेन में चल रही हैं तो कहीं ना कहीं कनेक्टिविटी की समस्या तो आपको आयेगी ही । लेकिन उनका पुरजोर तरक् यही रहा कि भारत बिल्कुल बेकार है यहां कुछ भी ठीक से काम नहीं करता ।
मैने उनसे कहा-
भारत में जो है वो अमेरिका में नहीं है और जो अमेरिका में है वो भारत में नहीं है । आप दोनों देशों को अच्छे से समझती होंगी । आप डॉक्टर हैं क्या ।
उन्होने जवाब दिया-
 नहीं मैं इंजीनियर हूं और मैनें 1964 में रूड़की इंजिनियरिंग कॉलेज से इंजिनियरिंग की है ।
उनकी उम्र 60 के पार थी मुझे भी एक बार झटका लगा 60 के धशक में महिला इंजिनियर ? आपके माता पिता बहुत प्रोग्रेसिव रहे होंगें जो आपको लड़की होते हुए इंजिनियरिंग की पढ़ाई करवा दी ? ेकिन जो जवाब उन्होने मुझे दिया उससे मैं हैरान हो गयी --
नहीं मेरे पिता बहुत ही एमसीपी थे महिलाओं की कद्र करना नहीं जानते थे उन्हें लगता था महिलाएं किसी लायक नहीं होतीं उनसे बस खाना बनवा लो यही बहुत है ।
फिर आपको इंजिनियर कैसे बना दिया ?   खुद रूड़की  इंजिनियरिंग कॉलेज में पढ़ाते थे मुझे कहीं बाहर भेजना नहीं चाहते थे अपनी नज़रों के सामने रखना था तो इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता था ये बात दीगर है कि मैनें टॉप किया ।लेकिन फिर भी मुझे घर में वो दर्जा वो प्यार कभी नहीं मिला जो मेरे भाइयों को मिला ।
वो महिला जो कुछ देर पहले मेरे लिए बिल्कुल अंजान थी वो अपने जीवन के कडवे अनुभवों को मेरे सामने कहती चली गयीं । क्या दिल में इतना कुछ था जिसे वो किसी के भी सामने कह सकती थीं । अपनी मां को लेक भी वो बहुत दुखी थी ।  उन्होने बताया कि उनके पिता ने कभी  उनकी मां की कद्र नहीं की । शादी के कुछ दिन बाद ही उनसे कह दिया अपने मायके या मुझ में से किसी एक को चुन लो उनसे मतलब रखोगी तो मुझ से नहीं । मां ने बिना विरोध किए मायके आना जाना छोड़ दिया । लेकिन उनके   मामा आते रहे औऱ  उनकी  मां का पूरा खर्च यहां तक कि कपड़े भी मामा ही देकर जाते थे । और  उनके  पिता को इस पर कोई एतराज नहीं था । मां के पेट में भयंकर दर्द रहता डॉक्टरों ने बताया कि ऑपरेशन होगा लेकिन पिता ने नहीं कराया कराया भी तो 50 साल के बाद ।
     एक लड़की जिसने अपनी मां को तिल तिल कर मरते देखा होगा जिसने मां को पिता का  अत्याचार सहते देखा हो वो कितनी कड़वाहट लेकर डर मन में पाल कर बड़ी हुई होगी । मुझे उनसे सहानुभूति होने लगी लेकिन मैंने उनके प्रवाह को रोका नहीं शायद एक अंजान हमसफर के सामने अपना दिल खोल कर उनका मन हल्का हो रहा हो । फिर उन्होने  अचानक मुझसे पूछा तुम तो बहुत पढ़ी लिखी लगती हो और तुम्हारी बातचीत के लहजे से लगता है कि तुम बहुत एक्सपोज़ड हो क्या करती हो तुम । मैने उन्हें अपना छोटा सा परिचय दे दिया । मेरे हाथ में संतोष देसाई की जो किताब थी उसका मैं एक पन्ना भी नहीं पलट पायी थी । उन्होने किताब मेरे हाथ से ले ली और उसके कवर पेज पर लिखा नाम पढ़ने लगीं ।
उनकी बातचीत का रूख एकदम बदल गया उन्होने मुझसे पूछा कि किसी भारतीय महिला ने उन्हें अमेरिका में बताया कि भारत में महिलाओं की स्थिती बहुत खराब है । शादियों में बहुत देहज लिया जाता है ससुराल वाले जला कर मार देते हैं । नौकरियों में बहुत शोषण है तरक्की नहीं दी जाती अहम पदवी नहीं दी जाती । गर्भ में ही लड़कियों की हत्या कर दी जाती है पूरे पूरे गांव ऐसे हैं जहां एक भी लड़की नहीं है । ये किस हद तक सही है ?  मैं पशोपेश में पड़ गयी विदेशी मीडिया में भारत की नेगेटिव छवि का ही शायद ये असर था । मैने उन्हे बताया आप को जिसने ये बताया उनकी राय कुछ हद तक सही हो सकती है लेकिन शतप्रतिशत सही नहीं है । बहुत कुछ बदला है आज हर क्षेत्र में आपको लड़कियां काम करती नज़र आ रही हैं पढ लिख भी रहीं है तरक्की की राह पर हैं । लेकिन पुरूषों की मानसिकता नहीं बदली है । अमेरिका में भारतीय पुरूषों की छवि बहुत खराब है जबकि भारतीय महिलाओं को संजीदा और विनम्र माना जाता है ।                            
  वो पिछले 25 --30 साल से अमेरिका में हैं उन्होने वहां गए भारतीय पुरूषों के व्यवहार को अच्छे से जाना और समझा अपने पति के बारे में भी उन्होने बहुत सी बातें बताई । पति भी इंजिनियर हैं लेकिन उन्हें मलाल है कि पति ने उन्हें कभी अपना हमसफऱ जीवनसाथी माना ही नहीं । वो अपने दिल का दर्द कहती चली गयी उनकी आवाज में एक तरह की निस्पृहता थी भावावेग नहीं था शायद इतने बरसों में वो अपने मन की पीड़ाओं के साथ जीना सीख गयी हैं । उनकी बातचीत अपने पिता पति और भाइयों के आस पास ही केंद्रित रही । उनकी मां अपने ज़माने की पोस्ट ग्रेजुएट महिला थीं लेकिन पिता ने कद्र नहीं की वो इंजिनियर थीं। पति ने कद्र नहीं की उन्होने बताया कि उनके पति उन्हें इतना मारते थे कि वो जब तक बेहोश नहीं हो जातीं पिटते रहते । अब पति से उन्होनें तलाक ले लिया है लेकिन तलाक ले लेने से क्या पुरानी यादों से तलाक हो जाता है यादें कहां पीछा छोड़ती हैं । अपनी और अपनी मां की आपबीती वो सुनाती रहीं । उनके पिता ने कभी उनकी मां की पिटाई नहीं की लेकिन भावनात्मरूप से उन्हें सबसे अलग थलग कर दिया । औऱ यहां तक कि उन्हें पागल भी करार दे दिया । और सबको यकीन दिला दिया कि वो मानसिक रूप से असंतुलित हैं । लेकिन उन्हें पूरा यकीन है कि उनकी मां कतई पागल नहीं थीं अगर किसी के साथ इतना बुरा व्यवहार किया जाएगा तो कोई भी अजीब सा हो जाएगा । उन्होने  कअपनी मां के मानसिक रूप से ठीक होने की एक घटना बताई । एक बार मां बहुत बीमार हुई तो सब भाई बहन आ गए देश विदेश से । जब उनके भाई मां से मिले तो पिता ने पूछा इन्हें पहचानती हो कौन है ?, बेटों ने पूछा हमें पहचानती  हो ? मां ने ना में गर्दन हिला दी । अब तो पिता ने कूद कूद कर अपने बयान की पुष्ठि की कि देखो मैं तो कहता ही हूं कि ये पागल हो चुकी है । लेकिन इस सब के बीच मां और बेची का आंखों की भाषा में संवाद चल रहा था । जब सब इदर उधर हो गए तो बेची ने मां का हाथ पकड़ कर कहा मां बताओ मैं कौन हूं ?  मां ने तुरंत गले लगा लिया और आंखों से आंसू बहने लगे और बोलीं  क्या तुम भी मुझे पागल समझती हो ? फिर  तुमने भाई को पहचानने से क्यों इंकार किया ?  जान बूझ कर किया जब मैं उसके पास रहने गयी तो उसने उसकी बीबी ने मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था । ये घटना इतना कुछ बता गयी कि औऱ कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं थी।
  अगर उच्च  शिक्षित और उच्च पदों पर बैठे लोग, समाज में जिनका ऊंचा दर्जा है , जो संभ्रांत और सुसंस्कृत  माने जाते हैं उनका अपनी पत्नी, अपनी बहन , अपनी बेटियों के साथ ऐसा व्यवहार है तो फिर हम आम लोगों को कैसे दोष दे सकते हैं । हम समाज बदलने की बात करते हैं लेकिन अपने घर में महिलाओं के साथ बुरा व्यवहार करते हैं। चार घंटे के सफर उन्होने मुझे और भी बहुत कुछ बताया । मैं उन्हें दोष बी नहीं दे सकती थी बारत में महिलाओं के दर्जे को वो अपने अनुभव अपने चश्में से ही देखेगीं। और बचपन से लेकर अब तक पुरूषों की जिस कूढ़ मगज़ मानसिकता से उनका पाला पड़ा वो उनकी अवधारणा को मज़बूत करने के लिए काफी था । शायद उन्हें पति अच्छा मिल जाता तो पिता के दिए जख्मों को वो भूल जातीं । उनकी आपबीती ने मेरे मन में बहुत से सवाल खड़े किए कितना बदला है हमारा समाज अगर एक इंजिनियर महिला के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर एक सामान्य लड़की की क्या हैसियत । आप सब के पास इन सवालों के जवाब हों तो मुझे ज़रूर बताएं ।
दिल्ली पहुंचते पहुंचते रात के पौने  बारह बज चुके थे और सहारनपुर से दिल्ली तक मेरे और उनके बीच  एक रिश्ता सा कायम हो गया । ऐसी कीं महिलाएं मुझे कई बार मिलीं, बिल्कुल अनजान लेकिन अपने दिल का दर्द ऐसे बताया मानों बरसों से हम एक दूसरे को जानते हों ।
अगली बार फिर कभी -------------                                   



10 टिप्‍पणियां:

  1. एक अलग ही कथा, हर यात्रा विशेष है।

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  2. इस संस्मरण से फिर साबित हुआ कि नारी मानसिक तौर पर बहुत मज़बूत होती है...

    पुरुष ऊपर से अपने को बेशक चट्टान बताता रहे लेकिन दबाव में उसे टूटते एक मिनट नहीं लगता...

    अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा...

    जय हिंद...

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  3. आपने यह नहीं बताया कि उस महिला के पति और भाई कहॉं रहते थे?

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  4. अजिता जी उनके पति अमेरिका में और एक भाई अमेरिका में और दूसरा भारत में रहता है ।

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  5. सर्जनाजी, मैंने यह प्रश्‍न इसलिए किया था कि अपनी टिप्‍पणी लिख सकूं। अब उस महिला की आपत्ति थी भारतीयों से। लेकिन उनके पति और भाई अमेरिका में रहकर भी नहीं सुधरे तो हम कैसे अकेले ही भारत को दोष दे सकते हैं? यह भी गौर करने लायक तथ्‍य है कि उनके पिता उनकी माँ को मारते नहीं थे, लेकिन उनके पति मारते थे। जैसे-जैसे हम पश्चिम की संस्‍कृति से जुड़ते गए, यह शक्तिशाली होने का रोग पाल बैठे। इसलिए उस महिला से कहिए कि दोंष भारत में नहीं है, दोष उस संस्‍कृति में है जिसे हम अपनाते जा रहे हैं। यदि अंग्रेजों के आने के पूर्व का भारत हम देखें तो भारत पूर्णतया सभ्‍य देश था। यह मैं नहीं कह रही, सारे ही इतिहासकार कहते हैं और वो भी यूरोप के। महिलाओं पर अत्‍याचार वहीं से आया है।

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  6. हर तरह के लोग हर समाज में है-जिसका जैसे अनुभव रहे.

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  7. आगे की कड़ी का इन्तजार करते हैं.

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. bahut khoobsurat prastuti hai....DIL-O-DAAD sweekar kare.. agar waqt ho to keripya meri likhi kahani par bhi ek najar farmaye..mujhe khusi hogi aapke comments padh ke..

    http://www.teri-yaade.blogspot.com/

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