रविवार, अप्रैल 3

जनकपुरी वेस्ट मैट्रो स्टेशन के पास मेन रोड़ के साथ वाली एक बाईलेन में आजकल लोगों का जमघट है घर के आसपास खड़े और वहां से गुज़रने वाले स्थानीय लोगों के चेहरों पर खौफ है । यही वो जगह है जहां शांति प्रिय डॉक्टर पंकज नारंग अपनी डॉक्टर पत्नी सात साल के बेटे और विधवा मां के साथ रहते थे । डॉक्टर पकंज नारंग की भीड़ ने पीट पीट कर इसलिए हत्या कर दी कि उन्होने तेज रफ्तार मोटर साईकिल सवारों को धीरे चलने की हिदायत दे दी थी । जो इन अराजक युवकों को नागावर गुज़रा और ये लोग कुछ देर बाद हॉकी पत्थर लेकर आए और डॉाक्टर पंकज और उनके जीजा को बेरहमी से पीटा डॉक्टर ने दम तोड दिया उनके जीजा अस्पताल में हैं । आज मैनें अपनी संस्था के चार अनेय सदस्यों के साथ वहां लगभग चार घंटे बिताए मीडिया पुलिस स्थानीय लोग समाज सेवी संस्थाएं घर के बाहर जुटी हैं । घर के भीतर मातम था आज डॉ पंकज की उठावनी थी । इतनी दर्दनाक और भयावह मौत घर के कुछ मीटर की दूरी पर बसी इंदिरा कैप नंबर चार झुग्गी झोंपड़ी कॉलोनी के एक समुदाय विशेष के लड़को की इतनी हिम्मत और हिमाकत की वो एक शरीफ इंसान को घर से घसीट कर पीट पीट कर मार डालें । इलाके के लोग डरे हैं ,सहमें हैं, गुस्से से उबल रहे हैं ,मीडिया और नेताओं को कोस रहे हैं ।
सबसे ज्यादा नाराज़गी मीडिया से है वो कहते हैं ---एक अखलाक मारा जाता है तो मीडिया छाती पीट पीट कर सांप्रदायिकता का रंग दे देता है और एक संप्रदाय विशेष के लोग आकर जान से मार जाएं तो रोड़ रेज कहते हैं और सांप्रदायिक सद्भाव रखने की अपील करते हैं । क्यों क्या हमारा कसूर इतना है कि हम मुस्लमान ,दलित य़ा ईसाई नहीं है । कुछ चैनलों और उनके दिग्गज पत्रकारों को लोग नाम ले ले कर कोस रहे थे । ---- काफी हद तक दिल्ली का आम आदमी अपनी जगह सही है औऱ आम आदमी की सरकार से भी उनको बहुत शिकायत है वो पूछ रहे थे --- कहां है केजरीवाल ? उसे दादरी हैदराबाद और पंजाब जाने का टाईम है लेकिन यहां आने का नहीं ? अगर यही घटना उल्ट हुई होती तो यहां मातमपुरसी करने वाले बड़े नेताओं की लाईन लग जाती ।
सवाल गंभीर है औऱ जायज भी आखिर मीडिया जब एक खबर पर एक ट्रेंड सेट करता है तो लोगों को उससे अपेक्षा बढ़ जाती हैं । लेकिन जब उसी तरह की दूसरी खबर पर वो चुप्पी साध लेता है या मामले की गंभीरता को कम करके आंकता हैं तो लोगों को गुस्सा आना स्वाभाविक है । मीडिया के लिए समाज में जिस तरह की नफरत पल रही है किसी दिन वो भयंकर रूप ले सकती हैं । पता नहीं मीडिया के दिग्गज इससे वाकिफ हैं या नहीं जो खतरनाक खेल मीडिया और सियासी दल खेल रहे हैं उसके परिमाण बहुत भयंकर ही होंगें अच्छे तो नहीं । दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिशनर दीपेंद्र पाठक नारंग परिवार के यहां शोक जताने पहुंचे और उन्होनें साफ कहा कि --- ये रोड़ रेज नहीं है ये साफ साफ हत्या है और वो भी सुनियोजित तरीके से ---- लेकिन मीडिया के दिग्गजों से लेकर सिटी रिपोर्टर तक इसे रोड़ रेज कह रहे है ।
इलाके के लोग कहते हैं---- "हम अपनी मौत का इंतज़ृार कर रहे हैं आज डॉ नारंग को मारा कल हमें मार जायेंगें । दरअसल इस इलाके की इंदिरा कॉलोनी नंबर चार झुग्गी झोंपड़ी बस्ती का आंतक बढ़ता ही जा रहा है यहां बांग्लादेशी मुस्लमानों की अच्छी खासी संख्या है । इलाके में चोरी चकारी लूट पाट करना इनका पेशा है लोग कहते हैं ये हमारी बहू बेटियों को छेड़ते हैं लड़कियों का घर से निकलना दुश्वार है । नशे का धंधा ,जुआ ,सट्टा आम बात है । पिछले साल विकासपुरी में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला को भी इसी बस्ती के लड़कों नें मार डाला था और एक मॉल के गार्ड को भी मौत के घाट उतार दिया था । स्थानीय लोगों के पास इनकी बदमाशी के किस्सों की भरमार है । लेकिन इनका शरीफ आदमी कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इन्हें पहले कांग्रेस की और अब आम आदमी पार्टी की तरफ से सुरक्षा की गारंटी मिली हुई है " ।
क्या वोट बैंक की खातिर हमारे सियासी दल इतना गिर जायेंगें कि गैरकानूनी तरीके से भारत में रह रहे घुसपैठियों के मसीहा बन जायेंगें ?क्या इतना गिर जायेंगें कि एक मौत को जाति और धर्म का चोला पहना कर अपना नफा नुकसान देखेंगें? अखलाक ने बिहार जिता दिया अब हौंसलें और बुलंद हैं । अब तो देश भक्ति ,आतंकवादी , देश प्रेम और भारत माता पर भी सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए हैं . पहले सनातन धर्म के त्यौहारों के खिलाफ अभियान चलाया अब उन विषयों को भी उठा लिया जिन पर सावल खड़े करने की कोई गुंजाईश नहीं है । अखलाक मारा जाता है तो एक सुनियोजित तरीके से बुद्धिजीवी भी सम्मान लौटाने लगे मानों खुद प्रधानमंत्री ने अखलाक की सुपारी दी थी । लेकिन अब जब दादरी जैसी घटना दिल्ली में हुई तो सब बुद्दिजीवी कलाकार और सेकुलर पत्रकार चुप है । यदि वो अखलाक के मामले में भी ऐसा ही रूख रखते तो शायद लोगों को तकलीफ ना होती ये दोहरा रवैया क्यों ?अब भी कुछ अवार्ड वापिस होने चाहिए । अब भी मीडिया को असहिष्णुता पर लंबी बहसें करनी चाहिएं । खतरनाक खेल चल रहा है आने वाली पीढी का क्या होगा -------- आम आदमी की सुरक्षा का क्या होगा ?विकास पुरी में लोग यहां तक कह रहे थे कि अब बहुसंख्यकों के लिए भी आयोग बनना चाहिए ।
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शनिवार, अगस्त 1

              मेरी हीरोईन मेरी केला चाची


मेरी बीजी के दुनिया से चले जाने के बाद पहली बार साढ़े तीन साल बाद ममता भरे स्पर्श ने सहलाया गले लगाया बार बार सिर पर हाथ फेरा तो अहसास हुआ कि मां की ममता का जीवन में कितना मोल होता बीजी पापा के बिना जीवन में जो सूनापन है उसे कोई दूर नहीं कर सकता । लेकिन 28 जुलाई को लगभग 35 -36 साल के बाद अपने पैतृक गांव गए तो केला चाची जी ने इतना प्यार इतना  दुलार दिया कि मन और आंखे भर भर कर आ रहे थे । मुझे मेरी बहन और उसके पति को देख कर केला चाची जी कितनी खुश हुई इसे उन्होनें शब्दों में कम और अपने ममता भरे स्पर्श में ज्यादा व्यक्त किया ।
कितना लंबा समय गुज़र गया । गर्मियों की छुट्टियों में जब हम अपने गांव जाते तो खूब धमा चौकड़ी करते थे । केला चाची जी का घर हमारे घर के बिल्कुल साथ था । हमारी बचपन की सखा रूकमणि उसकी बहन उमा भाई सुंदर और बाली के साथ हमारी बहुत पटती थी । रूकमणि परसा दादा जी के परिवार से थी और उसी परिवार से थीं केला चाची जी । बचपन में केला चाची जी को हम बार बार देखा करते उनका सोने सा दमकता रंग और चांद जैसा गोलमटोल  चेहरा नाक में मोती और सीधे पल्ले की सूती धोती पहने केला चाची जी को हमने बहुत मेहनत करते देखा था । सुबह घर के काम धंधें में तो 11 बजे के आसपास वो अपने घेर  में चली जातीं अपने खेतों में जातीं थी । आते जाते वो हमारे घर आती थीं । आकर मेरी दादी जी मेरी ताई जी और मेरी बीजी के पैर छूतीं । हम देखते थे कि जो भी गांव की महिला घर आती थीं पैर छूने के बाद उन पर आशीषों की झड़ी लग जाती --- गूढ़ सुहागन रहो , तेरा साईं जीता रहें  दूधो नहाओ पूतो  फलों आदि आदि लेकिन केला चाची जी जब भी सबके पैर छूतीं सबके चेहरे मलिन से पड़ जाते और गहरी सांस लेकर मेरी दादी बुआ ताई और मेरी बीजी उन्हें कहती -- बहू दीदे गोड़े बने रहें तेरा लाल जीता रहे तुझे बहुत सुख दे । हमारा बालमन बहुत हैरान होता केला चाची जी इतनी सुंदर इतनी प्यारी फिर आशीर्वाद में इनके साथ ऐसा भेद भाव क्यों ।
        फिर धीरे धीरे इस राज़ से भी पर्दा उठा हमें पता चला कि केला चाची जी जब उन्नीस साल की भी नहीं हुईं थीं तो उनके पति चल बसे थे । 16 साल की उम्र में उनकी शादी हुई थी 17 वें साल में गोणा हुआ और तीन साल भी वो पति का सुख नहीं देखपायीं । हां बस एक सकून था कि उनका तीन महीने का एक बेटा था उस समय । जिसे सब शिवला कह कर बुलाते थे । शिवला हम से उम्र में छोटा था लेकिन बहुत ही प्यारा वो भी हमारे साथ खूब धमा चौकड़ी मचाया करता था ।
                                        केला चाची जी के परिवार के दुखों का अंत यहीं नहीं होता उनके ससुर भी दुनिया से चल बसे । पति और पुत्र की अकाल मृत्यु ने केला चाची जी की सास को जीते जी मार दिया । उन्होनें दुनियादारी छोड़ कर भगवान के साथ नाता जोड़ लिया वो केवल भगवान की भगती करतीं शायद अपना ग़म भुलाने का यही एक तरीका था उनके पास । अब 19 साल की केला चाची जी ने पूरी ज़िम्मेदारी अपने उपर ले ली वो चाहतीं तो अपने मायके लौट जातीं । दूसरी शादी कर लेतीं लेकिन नहीं उन्होनें घर बार खेत खलिहान का पूरा जिम्मा ले लिया दिन रात जी तोड़ मेहनत करतीं । हम हर साल गांव जाते केला चाची जी के रूप रंग पर त्याग तपस्या और सतीत्व की चमक बढ़ी हुई ही दिखाई देती । राजपूतों के गांव में बहू केवल घूंघट ही नहीं करती थीं बल्कि साड़ी के ऊपर ढ़ाई गज का एक दुप्पटा भी लपेटतीं  थीं । घर से बाहर निकलने के लिए ये बहुत ज़रूरी था मेरी बीजी का वो दुप्ट्टा आज भी मेरे पास सुरक्षित है । केला चाची जी भारी भरकम गठरियां और बोझ सिर पर रखतीं लेकिन क्या मज़ाल कि कभी उन्होनें किसी मर्यादा का उल्लघंन किया हो । उनके सामने भी वो सभी समस्याएं आयीं जो किसी भी सुंदर युवा विधवा के सामने आ सकतीं हैं लेकिन उन्हें दुनिया का कोई प्रलोभन डिगा नहीं पाया । सारे गांव को उनसे सहानुभूति थी और साथ ही उनकी तारीफ भी हर एक की जुबान पर रहती थी । चाची जी का बेटा शिवला बहुत लायक बच्चा निकला हमारे पूरे परिवार के साथ उसका संबंध आज भी ज्यों का त्यों है । हर खुशी हर गम में शिवला ज़रूर आता है  हमारा छोटा भाई लगता है । शिवले से बहुत बार मिलना हुआ मेरे बीजी पापा जी के निधन पर वो आया केवल आया ही नहीं हर  फ़र्ज भी निभाया । लेकिन चाची जी से मुलाकात अब ही हो पायी ।
              शिवले ने अपने घेर  ( पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पशुओं को बांधने , चारा रखने आदि के स्थान को घेर कहते हैं ) को अब अपना घर बना लिया है बहुत बड़ा और विशाल घर शिवले के चार बच्चे हैं ज़मीन जायदाद अच्छी खासी है खेती करता है और वो भी ऑर्गेनिक ।
        खैर इतने साल बाद जब केला चाची जी से मिलना हुआ तो उनसे बहुत सारी बातें हुईं दिल की ,घर की ,रिश्तेदारी की परिवार की । समय कम और किस्से ज्यादा थे । वो थोड़ी देर बाद कह देतीं आज तुम कैसे आ गयीं मेरा जीवन सफल हो गया । बहुत अच्छा लगा तुम आयीं । मेरी बीजी के साथ उनका एक खास रिश्ता था । जब वो बहुत दुखी होतीं थीं तो मेरी बीजी के पास आतीं थीं बहुत देर तक बातें करतीं आंखों में बहते आंसू धोती के पल्लू से पोंछतीं रहती थीं । हमारे मन में भी उनके प्रति बहुत प्रेम रहता था । जब उनसे चार दशक के बाद मिली तो लगा ही नहीं कि इतने साल बाद मिल रही हूं उनके रोम रोम से ममता उमड़ रही थी उनका हाथ बार बार हम दोनों बहनों के सिर पर आ जाता । शिवले की पत्नी ने हमारे लिए बहुत स्वादिष्ट खाना बना कर रखा था । केला चाची जी गिलास भर कर गाय का दूध ले कर आयीं मैं दूध पसंद नहीं करती लेकिन उनके स्नेह का मान रखना था इसलिए पी लिया लेकिन देसी गाय का दूध दिल्ली के दूध से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट लगा ।  हमें दिन के दिन दिल्ली लौटना था लेकिन चाची जी थीं कि सोच रहीं थी हमें कहां बिठा दें ,क्या खिला दें ,क्या उपहार दे दें । वो मरवे के पत्ते तोड़ कर लायीं बोलीं चटनी बना लेना । फिर बोलीं मेरे पास मरवे के बहुत सारे बीज हैं तुम ले जाओं दिल्ली अपने घर गमले में लगा लेना ।
                   फिर जवें लेकर आयीं । जवें नूडल्स का देसी वर्जन है जो महिलाएं घर में आटा बना कर खुद तोड़तीं हैं । तीन चार किलो जवें उन्होनें हमें दिए । और फिर मेरी बहन के पति जिन्हें उन्होनें पहली बार देखा था उनकी टीका  करके विदाई की । हमारे यहां जवांई को टीका करके शगुन और नारियल को गोला दिया जाता है । उन्होनें सारी वो रस्में निभाई जो बेटी के मायके आने पर निभाई जातीं हैं मुझे और मेरी बहन को भी टीका करके शगुन दिया ।
                            अपने गांव से  जब हम लौटे तो बहुत सारी यादें ताज़ा करके,  केला चाची जी का प्यार और  बहुत सारी ममता ,शिवले  भाई का स्नेह अपनी झोली में भर कर लौटे ।  ममता को तरसते किसी इंसान को ममता का सागर ही मिल जाए तो फिर और क्या चाहिए । सच ही है प्यार का कोई मोल नहीं है । रिश्ते मन के हैं  मन के भीतर उगे ऐसे पौधे हैं जो कभी मरते नहीं मुरझा ज़रूर जाते हैं लेकिन जैसे ही ममता और स्नेह का स्पर्श मिलता है फिर से खिल उठते हैं । केला चाची जी अगर कोई आधुनिक स्त्री होतीं तो उनकी संघर्ष की गाथा पत्रिकाओं का हिस्सा बनतीं , टीवी पर आने वाले स्त्री संबंधी कार्यक्रमों की कहानी बनतीं । लेकिन मेरे दिल में केला चाची जी बचपन से सुंदर ,बहादुर , त्यागमयी , तपस्यामयी ममतामयी हीरोइन रहीं हैं । और हमेशा रहेंगी ।
कठिन रास्तों को उन्होनें अपने तप के बल पर अकेले पार किया अपने बेटे को अकेले पाला पोसा बिना किसी सहारे के ।  मुझे पूरा विश्वास है केला चाची जी जैसी और भी बहुत सी साहसी महिलाएं हमारे समाज में हैं और उन्होनें अपने समाज में आदर्श स्थापित किए हैं ।

रविवार, जुलाई 12

  भगवान जगन्नाथ जी का नबकलेवर – भगवान भी करते हैं कायाकल्प


             बंगाल की खाड़ी के तट पर बसी पुरूषोत्तम पुरी में भगवान विष्णु पुरूषोत्तम के नाम से विराजते हैं . यहां उनका रंग ,उनका रूप , उनकी मूर्ति देश के सभी मंदिरों से भिन्न है । ये देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान का विग्रह लकड़ी का और अधूरा है . और यहां भगवान अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा और सुदर्शन के साथ हैं । सनातन परंपरा ये है कि एक बार मंदिर में जिस विग्रह की स्थापना हो जाए उसे गर्भगृह से हटाया नहीं जाता है । लेकिन पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर और इसकी परंपराएं अनोखी हैं । यहां भगवान साल में एकबार  दस दिन के लिए अपने गर्भ गृह से निकल कर अपनी मौसी रानी गुंडीचा के घर जाते हैं । तीनों भाई बहन भव्य और दिव्य रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर जाते  हैं इसलिए इसे रथयात्रा भी कहा जाता है ।
                         जगन्नाथ मंदिर की एक और अनोखी परंपरा है भगवान का नवकलेवर जिसे स्थानीय भाषा में नबकलेवर कहते हैं । नया कलेवर यानि कायाकल्प । भगवान जो अजर अमर अविनाशी हैं उनका कायाकल्प कैसे हो सकता है ? सवाल आप सबके मन में ज़रूर आएगा । लेकिन पुरी में भगवान के नवकलेवर की ये परंपरा बहुत रोचक और बहुत कठिन है । भगवान जगन्नाथ , उनके बड़े भाई बलभद्र , बहन सुभद्रा और सुदर्शन जी का नवकलेवर तब होता है जब दो आषाढ़ मास आते हैं । इस साल अधिक आषाढ़ मास है । अधिक मास को मल मास और पुरूषोत्तम मास भी कहते हैं । आषाढ़ मास में ही नवकलेवर इसलिए किया जाता है क्योंकि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की दिव्तिया को आरंभ होती है । और आषाढ़ एकादशी को समापन होता है । जब दो आषाढ़ मास होते हैं तो नयी मूर्तियां बनाने का समय मिल जाता है । इसबार  भगवान जगन्नाथ का नवकलेवर है । इससे पहले 1996 में नवकलेवर हुआ था ।
            नवकलेवर की पूरी प्रक्रिया बहुत रोचक है । पिछले चार बार से जो नवकलेवर की पूरी प्रक्रिया के प्रमुख रहे हैं रामकृष्णा दैतापति उनके अनुभव बहुत ही आलौकिक हैं जिन्हें वो सबके साथ साझा नहीं करना चाहते । असल में नवकलेवर के लिए नीम के वृक्ष की खोज में जंगलों में जाना पड़ता है वो भी नंगें पांव , उस पर शर्त ये भी कि किसी दूसरे के हाथ का बना खाना नहीं खाना । श्री रामकृष्णा दैतापति शबर जनजाति से हैं । शबर भगवान जगन्नाथ को अपना भाई मानते हैं । रथयाथा से लगभग दो पखवाड़े पहले भगवान की सेवा का पूरा कार्यभार  इनके हाथों में आ जाता है । और पूरे एक महीने दैतापति ही भगवान की  सेवा में रहते हैं ।
                 रामकृष्ण दैतापति ही इस बार भी नीम के वो चार आलौकिक वृक्ष खोज कर लाए जिनसे भगवान जगन्नाथ , बलभद्र , देवी सुभद्रा और भगवान सुदर्शन के विग्रह बनाए जाते हैं । जिस साल में नवकलेवर होता है उस साल रामनवमी के दिन 20 दैतापति सरकारी ताम झाम के साथ आलौकिक नीम के वृक्षों की खोज में पैदल यात्रा पर निकलते हैं । सबसे पहले दैतापति अपनी कुलदेवी मंगला देवी के मंदिर जाते हैं जो उड़ीसा के काकटपुर में है। यहां दैतापति निर्वस्त्र हो कर पूजा करते हैं । श्री रामकृष्ण दैतापति का मानना है कि बच्चा केवल अपनी मां के सामने निर्वस्त्र हो सकता है । काकटमंगला देवी आजतक रामकृष्ण दैतापति को सपने में निर्देश देती आयी हैं कि उन्हें किस दिशा में नीम के वृक्षों की खोज में निकलना है । काकट मंगला देवी से निर्देश लेकर खोज यात्रा आगे बढ़ती है ।
            किसी भी नीम के वृक्ष  से भगवान का नवकलेवर हो सकता है ऐसा नहीं है । जिससे नवविग्रह बनाए जात हैं  वो वृक्ष विशेष होते हैं इनकी 11 पहचान होती हैं ---  ये वृक्ष जंगल के पूरे इलाके में सबसे लंबा होगा, इसके नीचे नाग और उपर बूढ़ा सांप रहता है । वृक्ष पर कोई पक्षी नहीं बैठता । इस पर शंख , चक्र पद्म , गदा बनी होती है पेड़ प्राची नदी के आस पास के जंगलों में पाए जाते हैं । इनके पास श्मशान और तुलसी का पौधा होता है ।
                        सभी चारों विग्रह नीम के एक ही वृक्ष से नहीं बनाए जा सकते । भगवान जगन्नाथ के वृक्ष का रंग काला , बलभद्र का सफेद , देवी सुभद्रा का पीली रंगत वाला और भगवान सुदर्शन का लाल रंगत लिए होता है ।
                     जब ये वृक्ष मिल जाते हैं तो इनके नीचे तीन दिन तक घी और चावल की आहुति से  यज्ञ किया जाता है तीन दिन तक दैतापति अन्न जल ग्रहण करना तो दूर  अपना थूक भी गले से नीचे नहीं करते । यज्ञ के दौरान वृक्ष के नीचे रहने वाला सांप बाहर निकल आता है । और ये किसी को कुछ नहीं कहता । इनसे किसी को भय भी नहीं लगता । रामकृष्ण दैतापति जब 19 वर्ष के थे तभी से उन्हें नवकलेवर के वृक्ष खोज कर लाने का सौभाग्य मिल रहा है । उनके पास सुनाने के लिए बहुत सारे रोमांचक  प्रसंग हैं वो बताते हैं जो वृक्ष काटा जाता है उसकी सारी लकड़ी साथ नहीं ले जाते जो लकड़ी बच जाती है उसे ज़मीन में दबा दिया जाता है यदि कोई भूल से भी इस लकड़ी को अपने साथ अपने घर ले जाता है तो सांप उसके घर तक उसका पीछा करते हैं और उसी के घर में घूमते रहते हैं । फिर उस इंसान को लकड़ी वहीं वापस ले जानी पड़ती है । इसलिए कोई भी लकड़ी घर ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।
                   इस बार चारों वृक्ष खोजने में 54 दिन लगे भगवान जगन्नाथ के विग्रह के लिए उड़ीसा के जगतसिंह पुर जिले के रघुनाथपुर के जंगलों में नीम का वृक्ष मिला , भाई बलभद्र के विग्रह का वृक्ष भी जगतसिंह पुर के सरला गांव के आसपास मिला देवी सुभद्रा का भी इसी जिसे के अडंग गांव के जंगलों में मिला। भगवान सुदर्शन का वृक्ष मिला भुवनेश्वर के  पास घड़कुंटनी में ।
चारों वृक्षों को विधि विधान से पूजन करके काट कर श्री जगन्नाथपुरी लाया जाता है । रामकृष्ण दैतापति बताते हैं कि इस पूरी यात्रा के दौरान नाग उनकी और उनके पूरे दल की रक्षा करते हैं और पुरी तक साथ भी आते हैं । जब तक नीम के वृक्ष श्री मंदिर के भीतर सुरक्षित नहीं पहुंच जाते तब तक नाग साथ रहते हैं ।
                    मंदिर के भीतर रात के समय गुप्त रूप से दैतापति चारों विग्रहों का निर्माण करते हैं । दैतापतियों के अलावा कोई और मूर्ति निर्माण का साक्षी नहीं बन सकता । जब नवकलेवर विग्रह बन जाते हैं तो आषाढ़ महीने की अमावस को नए और पुराने विग्रहों को आमने सामने रखा जाता है । पुराने विग्रहों से ब्रहम (प्राण ) की स्थापना नए विग्रहों में आधी रात के समय अति गुप्त रूप से की जाती है । और पुराने विग्रहों को मंदिर के विशाल परिसर में बने कोयला बैकुंठ में समाधि दे दी जाती है । इस बार 15 जून की रात को सारी प्रक्रिया पूरी की गयी ।
          कोयला बैकुंठ में विग्रहों की समाधि के बाद दैतापति वैसे ही 13 दिन का शोक मनाते हैं जैसे हम अपने किसी प्रियजन की देहयात्रा पूरी होने पर मनाते हैं । और सभी श्राद्ध कार्यों के बाद तेरहवीं के बाद शुद्धिकरण के बाद दैतापति नव विग्रहों की पूजा अर्चना और सभी सेवा निजोग आरंभ कर देते हैं ।
नवकलेवर की सारी प्रक्रिया पुरी के  श्री मंदिर में पूरी हो चुकी है नए कलेवर के साथ भगवान मंदिर के गर्भ गृह में रत्नसिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं । और बस अब प्रतीक्षा है विश्वप्रसिद्ध परम पावन रथ यात्रा की जो  17 जुलाई से आरंभ होगी ।