रविवार, अप्रैल 3

जनकपुरी वेस्ट मैट्रो स्टेशन के पास मेन रोड़ के साथ वाली एक बाईलेन में आजकल लोगों का जमघट है घर के आसपास खड़े और वहां से गुज़रने वाले स्थानीय लोगों के चेहरों पर खौफ है । यही वो जगह है जहां शांति प्रिय डॉक्टर पंकज नारंग अपनी डॉक्टर पत्नी सात साल के बेटे और विधवा मां के साथ रहते थे । डॉक्टर पकंज नारंग की भीड़ ने पीट पीट कर इसलिए हत्या कर दी कि उन्होने तेज रफ्तार मोटर साईकिल सवारों को धीरे चलने की हिदायत दे दी थी । जो इन अराजक युवकों को नागावर गुज़रा और ये लोग कुछ देर बाद हॉकी पत्थर लेकर आए और डॉाक्टर पंकज और उनके जीजा को बेरहमी से पीटा डॉक्टर ने दम तोड दिया उनके जीजा अस्पताल में हैं । आज मैनें अपनी संस्था के चार अनेय सदस्यों के साथ वहां लगभग चार घंटे बिताए मीडिया पुलिस स्थानीय लोग समाज सेवी संस्थाएं घर के बाहर जुटी हैं । घर के भीतर मातम था आज डॉ पंकज की उठावनी थी । इतनी दर्दनाक और भयावह मौत घर के कुछ मीटर की दूरी पर बसी इंदिरा कैप नंबर चार झुग्गी झोंपड़ी कॉलोनी के एक समुदाय विशेष के लड़को की इतनी हिम्मत और हिमाकत की वो एक शरीफ इंसान को घर से घसीट कर पीट पीट कर मार डालें । इलाके के लोग डरे हैं ,सहमें हैं, गुस्से से उबल रहे हैं ,मीडिया और नेताओं को कोस रहे हैं ।
सबसे ज्यादा नाराज़गी मीडिया से है वो कहते हैं ---एक अखलाक मारा जाता है तो मीडिया छाती पीट पीट कर सांप्रदायिकता का रंग दे देता है और एक संप्रदाय विशेष के लोग आकर जान से मार जाएं तो रोड़ रेज कहते हैं और सांप्रदायिक सद्भाव रखने की अपील करते हैं । क्यों क्या हमारा कसूर इतना है कि हम मुस्लमान ,दलित य़ा ईसाई नहीं है । कुछ चैनलों और उनके दिग्गज पत्रकारों को लोग नाम ले ले कर कोस रहे थे । ---- काफी हद तक दिल्ली का आम आदमी अपनी जगह सही है औऱ आम आदमी की सरकार से भी उनको बहुत शिकायत है वो पूछ रहे थे --- कहां है केजरीवाल ? उसे दादरी हैदराबाद और पंजाब जाने का टाईम है लेकिन यहां आने का नहीं ? अगर यही घटना उल्ट हुई होती तो यहां मातमपुरसी करने वाले बड़े नेताओं की लाईन लग जाती ।
सवाल गंभीर है औऱ जायज भी आखिर मीडिया जब एक खबर पर एक ट्रेंड सेट करता है तो लोगों को उससे अपेक्षा बढ़ जाती हैं । लेकिन जब उसी तरह की दूसरी खबर पर वो चुप्पी साध लेता है या मामले की गंभीरता को कम करके आंकता हैं तो लोगों को गुस्सा आना स्वाभाविक है । मीडिया के लिए समाज में जिस तरह की नफरत पल रही है किसी दिन वो भयंकर रूप ले सकती हैं । पता नहीं मीडिया के दिग्गज इससे वाकिफ हैं या नहीं जो खतरनाक खेल मीडिया और सियासी दल खेल रहे हैं उसके परिमाण बहुत भयंकर ही होंगें अच्छे तो नहीं । दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिशनर दीपेंद्र पाठक नारंग परिवार के यहां शोक जताने पहुंचे और उन्होनें साफ कहा कि --- ये रोड़ रेज नहीं है ये साफ साफ हत्या है और वो भी सुनियोजित तरीके से ---- लेकिन मीडिया के दिग्गजों से लेकर सिटी रिपोर्टर तक इसे रोड़ रेज कह रहे है ।
इलाके के लोग कहते हैं---- "हम अपनी मौत का इंतज़ृार कर रहे हैं आज डॉ नारंग को मारा कल हमें मार जायेंगें । दरअसल इस इलाके की इंदिरा कॉलोनी नंबर चार झुग्गी झोंपड़ी बस्ती का आंतक बढ़ता ही जा रहा है यहां बांग्लादेशी मुस्लमानों की अच्छी खासी संख्या है । इलाके में चोरी चकारी लूट पाट करना इनका पेशा है लोग कहते हैं ये हमारी बहू बेटियों को छेड़ते हैं लड़कियों का घर से निकलना दुश्वार है । नशे का धंधा ,जुआ ,सट्टा आम बात है । पिछले साल विकासपुरी में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला को भी इसी बस्ती के लड़कों नें मार डाला था और एक मॉल के गार्ड को भी मौत के घाट उतार दिया था । स्थानीय लोगों के पास इनकी बदमाशी के किस्सों की भरमार है । लेकिन इनका शरीफ आदमी कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इन्हें पहले कांग्रेस की और अब आम आदमी पार्टी की तरफ से सुरक्षा की गारंटी मिली हुई है " ।
क्या वोट बैंक की खातिर हमारे सियासी दल इतना गिर जायेंगें कि गैरकानूनी तरीके से भारत में रह रहे घुसपैठियों के मसीहा बन जायेंगें ?क्या इतना गिर जायेंगें कि एक मौत को जाति और धर्म का चोला पहना कर अपना नफा नुकसान देखेंगें? अखलाक ने बिहार जिता दिया अब हौंसलें और बुलंद हैं । अब तो देश भक्ति ,आतंकवादी , देश प्रेम और भारत माता पर भी सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए हैं . पहले सनातन धर्म के त्यौहारों के खिलाफ अभियान चलाया अब उन विषयों को भी उठा लिया जिन पर सावल खड़े करने की कोई गुंजाईश नहीं है । अखलाक मारा जाता है तो एक सुनियोजित तरीके से बुद्धिजीवी भी सम्मान लौटाने लगे मानों खुद प्रधानमंत्री ने अखलाक की सुपारी दी थी । लेकिन अब जब दादरी जैसी घटना दिल्ली में हुई तो सब बुद्दिजीवी कलाकार और सेकुलर पत्रकार चुप है । यदि वो अखलाक के मामले में भी ऐसा ही रूख रखते तो शायद लोगों को तकलीफ ना होती ये दोहरा रवैया क्यों ?अब भी कुछ अवार्ड वापिस होने चाहिए । अब भी मीडिया को असहिष्णुता पर लंबी बहसें करनी चाहिएं । खतरनाक खेल चल रहा है आने वाली पीढी का क्या होगा -------- आम आदमी की सुरक्षा का क्या होगा ?विकास पुरी में लोग यहां तक कह रहे थे कि अब बहुसंख्यकों के लिए भी आयोग बनना चाहिए ।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-04-2016) को "जय बोल, कुण्डा खोल" (चर्चा अंक-2303) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " कंजूस की मेहमान नवाज़ी - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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