पिछले साल अक्तूबर में हमारी एक आंटी का निधन हुआ उनके पति तो पहले ही परलोक सिधार चुके थे और दोनों बच्चे विदेश में बसे हैं । आंटी जीवन से भरपूर थीं अपनी शर्तों पर अपना जीवन जीती थी मस्त रहती और एक्टिव सोशल लाइफ बिताती थीं हमसे आंटी का विशेष स्नेह था । आंटी नोएड़ा के आर्मी सेक्टर में रहती थीं । उनके निधन के बाद दोनों बच्चों को विदेश जाना था . डेथ सर्टिफिकेट लेना ज़रूरी था लेकिन जिन जनाब को देना था उन्होने किसी के माध्यम से मोटी रिश्वत मांगी क्योंकि वो भी जानता था कि इन्हें विदेश लौटना ही है और उससे पहले सर्टिफिकेट चाहिए । उन्होनें हमसे भी बात की ।
हमने एक स्थानीय पत्रकार के माध्यम से उन सरकारी कर्मचारी से बात की उन्होनें जो जवाब दिया आप भी सुनिए ---
"तुम्हें क्या पड़ी है? काम अपने तरीके से होता है तुम्हें ज्यादा जल्दी है तो जा कर डीएम से मिल लो "? इशारा साफ था कि मेरे रास्ते में मत आओ । बरसों से विदेश में बसे दोनों भाई बहन मौत पर भी रिश्वत मांगने से परेशाऩ हुए और कहने लगे अच्छा है हम इंडियां में नहीं रहते इस सबसे बचे हुए हैं ।
एक दिन अपने नोएडा फिल्म सिटी ऑफिस से निकल कर मैं तिपहिया आटो लेना चाहती थी . लेकिन यहां के ऑटो स्टेंड से ऑटो लेना कोई हंसी खेल नहीं है। दाम तो ऐसे बताते हैं कि इंसान इससे अच्छा तो टैक्सी ही ले ले । उन्हें इगनोर करते हुए मैं आगे बढ़ रही थी कि कुछ आटोटालक मेरे पीछे पीछे आ गए मैडम कहां जाना है । मैने कहा मेन सड़क से ले लूंगी तुम्हारे रेट ज्यादा होते हैं । लेकिन उनमें से एक दो बाजिब दाम पर चलने को स्वयं राजी हो गए ।
मैं एक आटो में बैठचालक ने स्वयं बात शुरू की ----"मैडम माफ करना क्या करें ज्यादा दाम लेना हमारी मजबूरी है । घर परिवार चलाना बच्चे पालना और फिर हर महीने पुलिस को 1500 रूपए देना । आप बताएं हम कहां से लायेंगें सवारी से ही निकालेंगें ना लेकिन मैडम आप मेरा मोबाइल नंबर ले लो आप को जब जाना हो एक आध घंटा पहले मुझे फोन कर देना मैं आपके ऑफिस के सामने आ जाऊंगा "।
ये किस्सा 2009 का है ।
मैं अक्सर मौर्निंग शिफ्ट में ऑफिस आती हूं . सुबह सुबह साढ़े पांच छह बजे यूपी और दिल्ली पुलिस की बहुत सी करतूतें देखते ङुए आती हूं । कहीं ट्रक रोक कर सीधे सीधे नोट ले रहे हैं तो कहीं डबलरोटी , बिस्कुट और रस बेचने की साइकिल या सेकूटर रोक कर खड़े रहते हैं और वो बेचारा उन्हें मुफ्त की डबलरोटी , बिस्कुट देकर ही जान छुड़ाता है । इस बार दीवाली पर तो हद ही हो गयी । एक आदमी फूलमालाएं लेकर जा रहा था । दीवाली से दो तीन दिन पहले फूल मालाएं बहुत महंगी हो जाती हैं । उसे भी रोक कर पुलिस वाले उससे मुफ्त की मालांए दे रहे थे ।
नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार के ये दो तीन मेरे अपने निजी अनुभव हैं , अनुभव तो और भी कईं हैं लेकिन अनंत गाथा लिखना बेकार है । सरकारी कर्मचारी जिन्हें सरकार उनके काम के बदले वेतन के अलावा भी बहुत कुछ देती है वो एक दिहाड़ीदार कामगार से भी पैसा एंठने में शर्म नहीं करते ।
अन्ना हज़ारे को जो आज इतना समर्थन मिल रहा है वो हम और आप जैसे भष्टाचार के सताए लोगों का ही मिल रहा है । सरकार से मिलने वाले वेतन को तो भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी केवल सूखी रोटी मानते हैं उस पर लगाने के लिए मख्खन तो रिश्वत से आता है । औऱ आजकल तो मोटी मलाई वाले विभागों में नौकरी करना बड़ा रूतबा है । रिश्ते करते समय लोग बहुत शान से कहते हैं -- अजी सैलरी पर ना जाए उपर की कमाई बहुत है आपकी बेटी राज करेगी । हम मान चुके हैं और स्ववीकार कर चुके हैं कि रिश्वत लेना देना कोई बुराई नहीं है । हम नेताओं को भले ही दिन रात कोस लें लेकिन नौकरशाही को खंगालने लगेगें तो भ्रष्टाचार के छोटे बड़े इतने किस्से सामने आयेंगें कि सात समुद्र की स्याही बनाने पर भी लिखे नहीं जा सकेंगें । कईं बड़ी मछलियां तो फंसी भी हैं ।
सोनिया गांधी की रैली हो या लाल कृष्ण आडवाणी की मुलायम सिंह की हो या मायावती की ।
लोगों की तो छोड़िए सरकार को ही अपने संस्थानों पर भरोसा नहीं है । बड़े और छोटे नेताओं और सरकारी अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते, मंहगें निजी स्कूलों में या विदेशों में पढ़ते हैं । नेता अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में नहीं करवाते । या तो निजी पांचसितारा अस्पतालों से करवाते हैं या फिर विदेशों में जाते हैं । सबसे ताजा उदाहऱण तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का है । यानि ये लोग मानते हैं कि सरकारी संस्थान भरोसे लायक नहीं है । सरकारी अस्पताल बदहाल है । इलाज के लिए गरीबों के धक्के खाने पड़ते हैं ड़ॉ हैं तो दवाई नहीं , दवाईं हैं तो बेड नहीं मिल पाता ।
विदेशों में इसके विपरीत है । मेरी एक जूनियर आजकल कनाडा में है । उसके पति आईबीएम के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं । वो भारत से गयी तो प्रेगनेंट थी । वो महेशा टच में रहती है फेस बुक से फोन से । सने बताया कि उसका पूरा लाज और डिलीवरी सरकारी अस्पताल में ही हुई । वो सरकारी बस से ही हर रोज़ अस्पताल जाती । वहां के लोग उसे बस में चढ़ते देखते तो आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लेते प्यारी सी मुस्कान देते बैठने की जगह देते और पूछते आर यू कमफर्टेबल ।
और उसने बताया कि सरकारी अस्पताल भारत के मंहगें पांच सितारा अस्पतालों जैसे साफ सुथरे , सुविधाओं से युक्त । सारी दवाएं अस्पताल स्वंय देता है । औऱ ड़ॉक्टरों का रवैया बहुत ही अच्छा । उसने बताया कि ड़ा. उसका चेकअप अच्छे से करते । एक डॉ. ने तो उसे बच्चों की प्यारी प्यारी पेटिंग दी और कहा अपने बेडरूम में टांगना, तुम्हारा बच्चा भी प्यारा होगा ।
ऐसे व्यवहार की अपेक्षा यहां ना तो आम जनता से की जाती है और नाही सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों से । मेरी बहन प्रेगनेंट थी हर रोज एक ही चार्टेड बस से दफ्तर जाती। बस क्योंकि जनकपुरी से बन कर चलती थी धौला कुंआ तक आते आते भर जाती लेकिन कभी किसी ने सीट देना तो दूर अपने साथ एडजस्ट करने की ऑफर भी नहीं दी । औऱ सरकारी अस्पतालों में क्या हाल रहता है वो किसी से छुपा नहीं है । आज निजी संस्थानों में स्कूल और अस्पताल फल फूल रहे हैं । अपनी मनमानी कर रहे हैं और आम आदमी मजबूर है करे तो क्या करे ।
अन्ना हजारे अगर भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते हैं तो क्या गलत है। हां तरीका गलत हो सकता है लेकिन विषय तो हर आदमी से जुड़ा है । हमारे नेताओं और नौकरशाही ने अगर सरकारी संस्थानों को श्रेष्ठ और भ्रष्टाचारमुक्त नहीं बनाया तो फिर निजी क्षेत्र की ही मनमानी चलेगी । यही नेता अपने निजी शिक्षण संस्थान और अस्पताल चला रहे हैं और खूब कमा रहे हैं ।
सरकार अपना घर संवार लेगी तो बहुत कुछ संवर जाएगा । आम जनता को राहत मिलेगी ।