शनिवार, अगस्त 20

अपना घर संवारे सरकार, सब संवर जाएगा





सर्जना शर्मा

  आप में से कइयों ने सारांश फिल्म देखी होगी जिसमें एक बूढ़ा पिता विदेश से आयी अपने जवान बेटे की लाश लेने के लिए एयरपोर्ट पर कस्टम विभाग के चक्कर काटता है उससे रिश्वत मांगी जाती है और एक दुखी  पिता के दिल का गुबार आक्रोश में बदल जाता है और वो बड़े अधिकारी के कमरे में जाता है और पाता है कि वहां कुर्सी पर बैठा अफसर तो उसका अपना ही पुराना स्टूडेंट है । अपने गुरू का ऋण चुकाने का समय आया तो स्टूडेंट पीछे नहीं रहा और वह बूढ़ा बिना रिश्वत दिए अपने बेटे की लाश घर ले जाता है । लेकिन ज़रा सोचिए ऐसे कितने लोग होंगें जिन्हें अपने पुराने स्टूडेंट मिल जाते हैं । आम आदमी को तो हर रोज रिश्वत की चक्की में पिसना पड़ता है । आप सबके पास सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के ना जाने कितने अनुभव होंगें और कितने आपने अपने दोस्तों , रिश्तेदारों से सुने होंगें ।
 पिछले साल अक्तूबर में हमारी एक आंटी का निधन हुआ उनके पति तो पहले ही परलोक सिधार चुके थे और दोनों बच्चे विदेश में बसे हैं । आंटी जीवन से भरपूर थीं अपनी शर्तों पर अपना जीवन जीती थी मस्त रहती और एक्टिव सोशल लाइफ बिताती थीं हमसे आंटी का विशेष स्नेह था । आंटी नोएड़ा के आर्मी सेक्टर में रहती थीं । उनके निधन के बाद दोनों बच्चों को विदेश जाना था . डेथ सर्टिफिकेट लेना ज़रूरी था लेकिन जिन जनाब को देना था उन्होने किसी के माध्यम से मोटी रिश्वत मांगी  क्योंकि वो भी जानता था कि इन्हें विदेश लौटना ही है और उससे पहले सर्टिफिकेट चाहिए । उन्होनें हमसे भी बात की । 
हमने एक स्थानीय पत्रकार के माध्यम से उन सरकारी कर्मचारी से बात की उन्होनें जो जवाब दिया आप भी सुनिए --- "तुम्हें क्या पड़ी है? काम अपने तरीके से होता है तुम्हें ज्यादा जल्दी है तो जा कर डीएम से मिल लो "? इशारा साफ था कि मेरे रास्ते में मत आओ । बरसों से विदेश में बसे दोनों भाई बहन मौत पर भी रिश्वत मांगने से परेशाऩ हुए और कहने लगे अच्छा है हम इंडियां में नहीं रहते इस सबसे बचे हुए हैं ।
 
                                                                   एक दिन अपने नोएडा फिल्म सिटी ऑफिस से निकल कर मैं तिपहिया आटो  लेना चाहती थी . लेकिन यहां के ऑटो स्टेंड से ऑटो लेना कोई हंसी खेल नहीं है। दाम तो ऐसे बताते हैं कि इंसान इससे अच्छा तो टैक्सी ही ले ले । उन्हें इगनोर करते हुए मैं आगे बढ़ रही थी कि कुछ आटोटालक मेरे पीछे पीछे आ गए मैडम कहां जाना है । मैने कहा मेन सड़क से ले लूंगी तुम्हारे रेट ज्यादा होते हैं । लेकिन उनमें से एक दो बाजिब दाम पर चलने को स्वयं राजी हो गए ।
 मैं एक आटो में बैठचालक ने स्वयं  बात शुरू की ----"मैडम माफ करना क्या करें ज्यादा दाम लेना हमारी मजबूरी है । घर परिवार चलाना बच्चे पालना और फिर हर महीने पुलिस को 1500 रूपए देना । आप  बताएं हम कहां से लायेंगें सवारी से ही निकालेंगें ना लेकिन मैडम आप मेरा मोबाइल नंबर ले लो आप को जब जाना हो एक आध घंटा पहले मुझे फोन कर देना मैं आपके ऑफिस के सामने आ जाऊंगा "।
 ये किस्सा 2009 का है ।
                                  मैं अक्सर मौर्निंग शिफ्ट में ऑफिस आती हूं . सुबह सुबह साढ़े पांच छह बजे यूपी और दिल्ली पुलिस की बहुत सी करतूतें देखते ङुए आती हूं । कहीं ट्रक रोक कर सीधे सीधे नोट ले रहे हैं तो कहीं डबलरोटी , बिस्कुट और रस बेचने की साइकिल या सेकूटर रोक कर खड़े रहते हैं और वो बेचारा उन्हें मुफ्त की डबलरोटी , बिस्कुट देकर ही जान छुड़ाता है । इस बार दीवाली पर तो हद ही हो गयी । एक आदमी फूलमालाएं लेकर जा रहा था । दीवाली से दो तीन दिन पहले फूल मालाएं बहुत महंगी हो जाती हैं । उसे भी रोक कर पुलिस वाले उससे मुफ्त की मालांए दे रहे थे ।
                                             
                     नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार के ये दो तीन मेरे अपने निजी अनुभव हैं , अनुभव तो और भी कईं हैं लेकिन अनंत गाथा लिखना बेकार है । सरकारी कर्मचारी जिन्हें सरकार उनके काम के बदले वेतन के अलावा भी बहुत कुछ देती है वो एक दिहाड़ीदार कामगार से भी पैसा एंठने में शर्म नहीं करते ।
                 अन्ना हज़ारे को जो आज इतना समर्थन मिल रहा है वो हम और आप जैसे भष्टाचार के सताए लोगों का ही मिल रहा है । सरकार से मिलने वाले वेतन को तो भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी केवल सूखी रोटी मानते हैं उस पर लगाने के लिए मख्खन तो रिश्वत से आता है । औऱ आजकल तो मोटी मलाई वाले विभागों में नौकरी करना बड़ा रूतबा है । रिश्ते  करते समय लोग बहुत शान से कहते हैं -- अजी सैलरी पर ना जाए उपर की कमाई बहुत है आपकी बेटी राज करेगी । हम मान चुके हैं और स्ववीकार कर चुके हैं कि रिश्वत लेना देना कोई बुराई नहीं है । हम नेताओं को भले ही दिन रात कोस लें लेकिन नौकरशाही को खंगालने लगेगें तो भ्रष्टाचार के छोटे बड़े इतने किस्से सामने आयेंगें कि सात समुद्र की स्याही बनाने पर भी लिखे नहीं जा सकेंगें । कईं बड़ी मछलियां तो फंसी भी हैं ।
सोनिया गांधी की रैली हो या लाल कृष्ण आडवाणी की मुलायम सिंह की हो या मायावती की ।
 
                                         लोगों की तो छोड़िए सरकार को ही अपने संस्थानों पर भरोसा नहीं है । बड़े और छोटे नेताओं और सरकारी अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते, मंहगें निजी स्कूलों में या विदेशों में पढ़ते हैं । नेता अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में नहीं करवाते । या तो निजी पांचसितारा अस्पतालों से करवाते हैं या फिर विदेशों में जाते हैं । सबसे ताजा उदाहऱण तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का है । यानि ये लोग मानते हैं कि सरकारी संस्थान भरोसे लायक नहीं है । सरकारी अस्पताल बदहाल है । इलाज के लिए गरीबों के धक्के खाने पड़ते हैं ड़ॉ हैं तो दवाई नहीं , दवाईं हैं तो बेड नहीं मिल पाता ।
 
   विदेशों में इसके विपरीत है । मेरी एक जूनियर आजकल कनाडा में है । उसके पति आईबीएम के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं । वो भारत से गयी तो प्रेगनेंट थी । वो महेशा टच में रहती है फेस बुक से फोन से । सने बताया कि उसका पूरा लाज और डिलीवरी सरकारी अस्पताल में ही हुई । वो सरकारी बस से ही हर रोज़ अस्पताल जाती । वहां के लोग उसे बस में चढ़ते देखते तो आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लेते प्यारी सी मुस्कान देते बैठने की जगह देते और पूछते आर यू कमफर्टेबल ।
 
और उसने बताया कि सरकारी अस्पताल भारत के मंहगें पांच सितारा अस्पतालों जैसे साफ सुथरे , सुविधाओं से युक्त । सारी दवाएं अस्पताल स्वंय देता है । औऱ ड़ॉक्टरों का रवैया बहुत ही अच्छा । उसने बताया कि ड़ा. उसका चेकअप अच्छे से करते । एक डॉ. ने तो उसे बच्चों की प्यारी प्यारी पेटिंग दी और  कहा अपने बेडरूम में टांगना, तुम्हारा बच्चा भी प्यारा होगा ।
                                        ऐसे व्यवहार की अपेक्षा यहां ना तो आम जनता से की जाती है और नाही सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों से । मेरी बहन प्रेगनेंट थी हर रोज एक ही चार्टेड बस से दफ्तर जाती। बस क्योंकि जनकपुरी से बन कर चलती थी धौला कुंआ तक आते आते भर जाती लेकिन कभी किसी ने सीट देना तो दूर अपने साथ एडजस्ट करने की ऑफर भी नहीं दी । औऱ सरकारी अस्पतालों में क्या हाल रहता है वो किसी से छुपा नहीं है । आज निजी संस्थानों में स्कूल और अस्पताल फल फूल रहे हैं । अपनी मनमानी कर रहे हैं और आम आदमी मजबूर है करे तो क्या करे ।
 
                                अन्ना हजारे अगर भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते हैं तो क्या गलत है। हां तरीका गलत हो सकता है लेकिन विषय तो हर आदमी से जुड़ा है । हमारे नेताओं और नौकरशाही ने अगर सरकारी संस्थानों को श्रेष्ठ और भ्रष्टाचारमुक्त नहीं बनाया तो फिर निजी क्षेत्र की ही मनमानी चलेगी । यही नेता अपने निजी शिक्षण संस्थान और अस्पताल चला रहे हैं और खूब कमा रहे हैं ।
 सरकार अपना घर संवार लेगी तो बहुत कुछ संवर जाएगा । आम जनता को राहत मिलेगी ।



12 टिप्‍पणियां:

  1. सरकार अपना घर संवार लेगी तो बहुत कुछ संवर जाएगा । आम जनता को राहत मिलेगी ।
    bahut sahi kaha hai sirjana ji aapne .
    sarthak aalekh badhai krishn janmashtmi kee.

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  2. सृजना जी,
    सरकार कहिए या संसदीय राजनीति, इसका निकम्मापन ही है जो आज देश के हर नागरिक में गुस्सा है...लेकिन दोष हम नागरिकों का भी है...हम अपने अधिकारों की बात करते हैं लेकिन कर्तव्य भूल जाते हैं...पैसे की दौड़ में सब भूल बैठे हैं कि किसी देश की पहचान उसके लोगों के चरित्र से होती है...हम सिर्फ अपनी निबेड़ने के लिए तमाम तरह के गलत कामों को प्रोत्साहित करते हैं...अपने बच्चों को ही बी प्रैक्टिकल का पाठ पढ़ा कर, दूसरों को पीछे धकेलने की कला सीखने को कहते हैं...ज़रूरत हमें खुद को भी सुधारने की है...

    जय हिंद...

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  3. भ्रष्टाचार झेलने की पीड़ा आज आक्रोश बनकर बिखर रही है।

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  4. आपने लिखा कि अन्‍ना का तरीका गलत है। मुझे समझ नहीं आता कि एक आम आदमी और कौन सा तरीका लाए? इस तरीके के बाद भी कहा जा रहा है कि जनता कौन होती है? जब जनप्रतिनिधि राजा बन बैठे हो तब कौन सा तरीका होगा?
    यह सच है कि विदेशों में व्‍यक्ति को बहुत महत्‍व दिया जाता है, ऐसा क्‍यों है? क्‍योंकि वहाँ के कानून पुख्‍ता है और व्‍यक्ति को सुविधा देने वाले हैं। हमारे यहाँ के कानून केवल नौकरशाहों और राजनेताओं के रक्षक भर हैं। देश में दोहरी व्‍यवस्‍था है जबकि विदेशों में कानून और व्‍यवस्‍था सभी के लिए समान हैं। बस शायद अन्‍ना की भी यही मांग है कि सभी के लिए कानून और व्‍यवस्‍था समान हों।

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  5. सर्जना जी
    अन्ना से बेहतर और कौन सा तरीका है क्या आप बता सकेंगी?
    मेरे ख्याल से शांतिपूर्ण तरीके से अनशन करना कोई गलत काम नही है और वो भी देश और जनता के हित मे ना कि अपने लिये और आज इसके अलावा और कोई रास्ता भी तो नही बचता ना तो क्या करे एक इंसान?

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  6. आदरणीय अजीत जी और प्रिय वंदना जी आप दोनों की आपत्ति सही है । शायद मैं अपनी बात ठीक से नहीं रख पायी मैनें लिखा है अन्ना का तरीका गलत हो सकता है । ये मैनें उन लोगों के नज़रिए से लिखा है जो कह रहे हैं कि कानून बनाने का काम संसद का है नाकि सिविल सोसायटी का । मैं तो 100 % अन्ना के साथ हूं ।

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  7. शालिनी जी धन्यवाद और कान्हा के जन्मदिन की आप को भी बधाई

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  8. खुशदीप जी आप ठीक कह रहे हैं । हम सबने भी अब ये सोच लिया है कि अपना काम निकालो । जैसे भी निकलता हो । और इसी तरह भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है ।

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  9. प्रवीण जी अपने काम के लिए रिश्वत देना आम इंसान ने अपनी नियती समझ ली है । जिन्हें सरकारी अपसरों से मोटे काम करवाने होते हैं वो मोटी रिश्वत देते हैं । कभी नगद तो कभी उपहारों के रूप में . हमारे एक बिजनैसमैन मित्र हैं । केंदीय मंत्रालयों में उनके बहुत से काम पडते रहते हैं । मंत्रालयों के नाम जानबूझ कर नहीं लिख रही हूं । वो बताते हैं कि मंत्रालयों में अहम पदों पर बैठे जो वरिष्ठ नौकरशाह दफ्तर में अपने को ईमानदार दिखाने का नाटक करते हैं हम उनके घर जाते हैं और उनका पत्नियों के लिए सोने और हीरे के सेट ले जाते हैं जिन्हें वो खुशी खुशी रख लेते हैं । और हमारा काम हो जाता है । मेरा तो यही मानना है कि जिस दिन नौकरशाही सुधर जाएगी उस दिन ढ़ांचा सुधर जाएगा भ्रष्टाचार समाप्त करने की शुरूआत सरकारी बाबुओं से ही होनी चाहिए ।

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  10. नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की , जय कन्हैया लाल की हाथी घोड़े पालकी । कृष्णजन्माष्टमी की सभी ब्लॉगर मित्रों को बधाई

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  11. आज कुशल कूटनीतिज्ञ योगेश्वर श्री किसन जी का जन्मदिवस जन्माष्टमी है, किसन जी ने धर्म का साथ देकर कौरवों के कुशासन का अंत किया था। इतिहास गवाह है कि जब-जब कुशासन के प्रजा त्राहि त्राहि करती है तब कोई एक नेतृत्व उभरता है और अत्याचार से मुक्ति दिलाता है। आज इतिहास अपने को फ़िर दोहरा रहा है। एक और किसन (बाबु राव हजारे) भ्रष्ट्राचार के खात्मे के लिए कौरवों के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है। आम आदमी लोकपाल को नहीं जानता पर, भ्रष्ट्राचार शब्द से अच्छी तरह परिचित है, उसे भ्रष्ट्राचार से मुक्ति चाहिए।

    आपको जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं एवं हार्दिक बधाई।

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  12. भ्रष्टाचार की जड़ अति लोभ,लालच और लोलुपता का होना है.
    जिसकी जड़ अज्ञान ,त्याग और प्रेम का लोप होते जाना और
    लचर क़ानून भी है.केवल क़ानून बन जाने से ही भ्रष्टाचार से
    मुक्ति मिल पायेगी,इसमें संदेह है.परन्तु,सद्-आचरण और
    सद् संकल्प के द्वारा अन्ना जी जो कोशिश कर रहें हैं,उसे
    नकारा नहीं जा सकता.

    आपकी मेहनत से लिखी गई इस पोस्ट के लिए आभार,सर्जना जी.

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