बुधवार, अगस्त 24

भादो की लस्सी कुत्तो की, कार्तिक की लस्सी पूतों को



  सर्जना शर्मा
             
 भादो की लस्सी कुत्तो की, कार्तिक की लस्सी पूतों को....
   ये सुनने में केवल एक लोक कहावत लगती है लेकिन इसके बहुत गूढ़ अर्थ हैं । और ये सीधा सीधा हमारी सेहत से जुड़ा है । हिंदू कैलेंडर का छठा  महीना भादों बरसात के दो महीनों में से एक है । सावन की रिमझिम बारिश में चारों और हरियाली की चादर फैली होती है तो भाद्रपद महीने की धूपछांव सावन की हरियाली को खत्म करने लगती है । हांलांकि बारिश इस महीने में भी पड़ती है लेकिन सूर्य चूंकि तब तक सिंह राशि में आ जाता है और शेर की तरह ही दहाड़ता दिखता है । इस महीने की धूप बहुत तीक्ष्ण होती है । इस महीने में भी  उन्हीं सब बीमारियों का डर रहता है जिनका  सावन में रहता हैं , वायरल , खांसी जुकाम , डायरिया मलेरिया डेंगू आदि । आयुर्वेद में इस महीने में खान पान के नियम बहुत सख्त  रखे गए । इस महीने में दही और लस्सी का प्रयोग तो बिल्कुल मना किया गया है । दही और लस्सी ही क्यों खमीर से बनने वाले जितने भी खाद्य पदार्थ जैसे इडली , वड़ा , डोसा , ढ़ोकला आदि कुछ भी  नहीं खाना चाहिए ।
इस महीने की उग्र धूप से शरीर में पित्त का संचय होता है । इसी कारण आपने देखा होगा कि कईं लोगों को बरसात में बहुत फोड़े फुंसियां निकलती हैं  इसलिए उन सब वस्तुओं के खाने की मनाही है जिससे पित्त बढ़े । अरबी , भिंडी , कटहल जिमिकंद नहीं खाना चाहिए । परवल , करेला , मेथी  दाना , कच्ची हल्दी , चिरायता और गिलोए का सेवन सेहत के लिए बहुत अच्छा है । आयुर्वेद के अनुसार इस महीने में पित्त शांत करने के लिए ठँडे दूध के साथ हरड़ का मुरब्बा खाना चाहिए । आंवले के साथ कुज्जे वाली मिश्री सुबह शाम लेनी चाहिए ।
                                                              इसी महीने में आता है गणेश उत्सव और गणेश जी पर दूर्वा चढ़ाई जाती है । महाराष्ट्र में तो दूर्वा की सुंदर माला बना कर गणेश जी को पहनायी जाती है । नन्ही दूब धार्मिक रूप से वृद्धि और विस्तार का प्रतीक है तो आयुर्वेद के अनुसार इसमें बहुत से गुण है  दूर्वा पित्त को शांत करती है । कोमल दूर्वा का रस अगर खाली पेट लिया जाए तो शरीर की गरमी शांत  होती है । और पित्त भी नियंत्रण में रहता है । दूर्वा  एंटिबायटिक भी है ।
 
                                             चातुर्मास विशेषकर बरसात में सोने से तीन घंटे पहले भोजन कर लेना चाहिए . क्योंकि इन महीनों विशेष रूप से बरसात में जठराग्नि मंद पड़ जाती है और पाचन शक्ति बहुत अच्छी नहीं होती । शुद्ध सात्विक और कम मिर्च मसाले का भोजन करना चाहिए ।
                                     
                                      भाद्रपद महीने  का नाम दो नक्षत्रों उत्तराभाद्रपद और पूर्वाभाद्रपद के नाम से पड़ा है । इस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा इन दोनों में से किसी एक नक्षत्र में होता है । वैदिक काल में इस महीने को नभस्य और षौष्ठपद कहा जाता था । उत्तराभाद्रपद और पूर्वा भाद्रपद दो दो सितारों से मिल  कर बने हैं यानि कुल मिला कर हुए चार सितारे । चारों सितारे मिल कर पलंग के पांयें की आकृति जैसे लगते  हैं । अकेला उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र का प्रतीक जुड़वां है । इसके स्वामी बृहस्पति और शनि हैं इसलिए इसमें सत गुणों  और तमस गुणों का टकराव रहता है ।
                                     भले ही भाद्रपद चातुर्मास का दूसरा महीना है जिसमें सभी  शुभ कार्य करने की शास्त्रों में मनाही है । क्योंकि इन महीनों में मन और तन दोनों ही कमज़ोर रहते हैं । नेगेटिव सोच हावी रहती है इसलिए अच्छे फैसले और शुभ कार्य नहीं किए जाते । लेकिन त्यौहारों और पर्वों की  इस  महीने में भरमार है । भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी उनकी शक्ति और सखी राधा रानी की जन्माष्टमी ,भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म , प्रथम पूजे जाने वाले गणपति बप्पा के जन्म की चतुर्थी और फिर पूरे दस दिन का गणपति उत्सव , भगवान विष्णु का वामन अवतार , केरल का ओणम उत्सव ये भी  दस दिन तक चलता है । पूरा केरल फूलों की रंगोलियों से सज जाता है । अपने राजा बलि के धरती पर आगमन की खुशी में केरलवासी दस दिन का उत्सव मनाते हैं । भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दैत्यराजा बलि से तीन पग धरती मांग ली थी और फिर तीन पग में पूरा ब्रह्मांड माप लिया और राजा बलि को पाताल में भेज दिया था । अपनी प्रजा को बलि बचन देकर गए थे कि इस महीने में दस दिन के लिए वो पृथ्वी पर हर साल आयेंगें । इसी महीने में जाहरवीर गुगापीर का पर्व भी आता है । और सुहागिनों का पर्व हरितालिका तीज भी  इसी  महीने में मनाया जाता है ।
 
                                               और भी बहुत से आंचलिक पर्व है भादों के महीने में । सारे उत्सव ,सारे पर्व मनाएं लेकिन साथ ही ऋतुचर्या के अनुसार चलें सेहत एकदम फिट रहेगी ।
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22 टिप्‍पणियां:

  1. सही बाद है, भादों में दही नही खाना चाहिये।

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  2. भादो दही, माघे मही, मरही नहीं,परही सही-छत्तीसगढ़ी कहावत है.
    अर्थात भादो में दही और माघ में लस्सी, जो पीएगा, वो मरेगा नहीं तो बीमार अवश्य पड़ेगा....

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  3. क्या शानदार टाइटिल है आपकी पोस्ट का.
    रसबतिया का सही आगाज है.
    फुर्सत से आकर पढता हूँ.

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. वाह सेहत का खजाना...

    अच्छी दिनचर्या सुझाई है..

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  6. प्रवीण जी ललित जी और दीपक जी ये तो आप मानेंगें ही कि हमारे पूर्वजों के पास ज्ञान का अपार खजाना था उन्होनें जीवन शैली जिस तरीके से तय की उसमें बीमारी की संभावना नहीं थी ज्ञान के खजाने को लोक कहावतों में भी बदला गया जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कहावत मेरी इस पोस्ट का टाईटल है और ललित जी ने छतीसगढ़ी कहावत लिखी है ।

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  7. वंदना जी धन्यवाद तेताला पर पोस्ट लेने के लिए पढ़ कर आप को प्रतिक्रिया भेजती हूं ।

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  8. राकेश जी ये तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के घर घर में कही जाने वाली लोक कहावत है । साधारण महिलाओं को भादों की लस्सी किसी को ना पिलाने के बारे में समझाने का शायद ये आसान तरीका था

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  9. अच्छी जानकारी मिली ... दही न खाने की बात पता नहीं थी ...

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  10. मेरे लिये भी नई जानकारी वह भी इस दिलचस्प लोक मुहावरे के रुप में । आभार सहित...

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  11. सर्जना ji
    बहुत रोचक शैली में लिखा है आपने yah आलेख .पूरा कब पढ़ लिया पता ही नहीं चला .कई नयी बातें पता चली .आभार

    BHARTIY NARI

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  12. आपके आयुर्वेद के ज्ञान से बहुत खुशी हुई.
    हमारे यहाँ 'दूर्वा' कहाँ मिलेगी ?
    बहुत अच्छा जानकारीपूर्ण आलेख है आपका.
    रसबतिया पर रोचक और सार्थक जानकारी
    प्रस्तुत कर रहीं है आप.
    बहुत बहुत आभार,सर्जना जी.

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  13. संगीता जी सुशील जी रोशी जी और शिखा जी आप सबको धन्यवाद सुशील जी बहुत दिन बाद आप रसबतिया पर आए कैसे हैं आप

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  14. बहुत सही।
    क्वार में करेला और भादो में दही नहीं खाना चाहिए।

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  15. बचपन में जब गाँव में रहता था, तो यह कहावत अक्सर दुहराते सुनता था-
    सावन साग न भादों दही, क्वार दूध न कार्तिक मही।
    आपका लेख इस कहावत के आयुर्वेदिक कारणों की सुन्दर व स्पष्ट व्याख्या करता है।

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  16. मयंक जी , देवेंद्र जी आपकी पीढ़ी लोक कहावतों में छुपे सेहत के खजाने के राज को जानती है लेकिन युवाओं को इससे परिचित कराने की आवश्यकता है

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  17. बहुत सुंदर,
    पहली बार आपके ब्लाग पर आया हूं
    बिल्कुल अलग अंदाज

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  18. बहुत सही....बेहतरीन जानकारी.

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  19. निवेदिता , महेंद्र और समीर जी धन्यवाद रसबतिया पर समय समय पर आते रहें अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराते रहें । पारखी गुणीजन ना हों तो लिखने का आनंद कहां ?

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