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मंगलवार, अगस्त 30

मोहे कपट, छल छिद्र ना भावा...



सर्जना शर्मा

            जन्माष्टमी से दो दिन पहले अखबार के साथ एक सुंदर सा रंगीन हैंडआऊट भी आया । ये हमारे इलाके के सनातन धर्म मंदिर के श्री कृष्णजन्माष्टमी समारोह के बारे में था । क्या क्या कार्यक्रम होंगें इसका पूरा ब्यौरा ,आयोजकों के नामों की लंबी चौड़ी सूची जैसा कि अक्सर होता ही है किसी का भी  नाम छूटने ना पाए इसकी पूरी कोशिश आयोजकों की रहती है । लेकिन इसमें एक बात जो सबसे अलग थी वो ये कि

चरणामृत सेवा ----  कमल चौधरी ( सभी नाम बदले हुए हैं )

केले का प्रसाद ------- अनुज गुप्ता

सेब का प्रसाद -----   संजय सूद

पंजीरी              ------  राज किशोर तनेजा

धनिए का प्रसाद ---    विनोद अग्रवाल

                                               और इस तरह से एक लंबी सूची थी । ऐसा मैनें तो  कम से कम पहली बार देखा कि भगवान को चढ़ाने वाले भोग का भी बखान किया जाए और बाकायदा नाम छपवाए जाएं । ये भगवान के प्रति भक्ति भाव है या जन्माष्टमी के बहाने अपने नाम का गुणगान करने की इच्छा पूर्ति । आज धार्मिक आयोजन शहर में अपनी धाक जमाने का माध्यम बन चुके हैं । व्यापारी वर्ग इसमें आमतौर पर आगे रहता है और मुख्य  अतिथी ज्यादातर बड़े पदों पर बैठे अफसर या फिर सियासी दलों के नेता होते हैं । दो साल पहले कृष्ण जन्माष्टमी का एक निमंत्रण आया . कवरेज के इरादे से भेजा गया था . साथ में दो तीन वीआईपी पास भी भेजे गए । दिल्ली में इनका जन्माष्टमी उत्सव काफी बड़ा और भव्य होता है । फिल्म जगत में बरसों अपनी सुंदरता के बल पर टिकी रहने वाली एक जानी मानी अभिनेत्री और नृत्यांगना इनके यहां नृ्त्य नाटिका प्रस्तुत करती हैं ।   वहां जो कवर करने गए और जो वीआईपी पास पर गए दोनो के ही अनुभव बहुत खराब रहे । रिपोर्टर को बैठने तक की जगह नहीं दी गयी । पानी तक नहीं पूछा और जिन्हें वीआईपी पास दिया था उन्होने आम लोगों से भी ज्यादा धक्के खाए और अंत में आम जनता के बीच में ही बैठे । लेकिन आयोजकों ने अपने लिए स्टेज के सामने बढ़िया सोफे और कुर्सियां लगवा रखी थीं । औऱ वहां एसी भी  लगवा रखे थे । खाना पीना भी बहुत बढ़िया चल रहा था क्योंकि वहां नेता और अफसर जो बैठे थे ।

                                                                 एक और सज्जन हैं, बड़े उद्योगपति हैं, निजी  कॉलेज स्कूल भी चलाते हैं. उन्होने मंदिर भी बनवा रखे हैं । साल में दो तीन बार भव्य आयोजन करते हैं जिसमें जाने माने भजन गायक , और  फिल्मी  सितारे आते हैं,  हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा करवाते हैं, गायकों को लाखों रूपए देते हैं । लेकिन किसी गरीब और ज़रूरतमंद की मदद करने को कह दिया जाए तो सुनी अनसुनी कर देते हैं । बात को ऐसा टालते हैं कि पूछिए मत, टरकाने की कला भी उन्हें बहुत अच्छी आती है ।

                                                     भगवान स्वयं कहते हैं कि --"-मोहे कपट , छल छिद्र ना भावा , सरल स्वभाव सो मोही पावा "। उन्हें तो केवल भक्ति भाव चाहिए लेकिन आज धर्म के नाम पर आडंबर और दिखावा ज्यादा है । जब तन मन धन सब है तेरा , तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा का भाव इंसान के मन में सचमुच आ जाएगा तो ऐसे दिखावे करने की जरूरत ही नहीं रहेगी । त्वदीय वस्तु गोविंदं तुभ्यं समर्पयामि हमारी भक्ति परंपरा का अंग रहा है । सनातन परंपरा में मान्यता है हमारे पास जो भी है,  सब कुछ उसी परमपिता परमेश्वर और जगत जननी मां का आशीर्वाद है। जब हम उसी का उसको अर्पण करते हैं तो फिर उसका ढ़ोल क्यों पीटा जाना चाहिए ?

                                               सभी भक्ति और धर्म की आड़ में अपना प्रचार प्रसार करते हों, ऐसा भी  नहीं है । एक जाना माना बड़ा घराना है, हरिद्वार में हर  की पैड़ी उनके पुरखों ने बनवायी और मालिकाना हक भी उन्हीं का है । उन्हीं के परिवार के एक व्यक्ति ने बताया कि उनके पुरखों ने वहां अपने नाम का जो पत्थर लगवाया वो ऐसी जगह पर लगवाया कि जब लोग गंगा जी से स्नान करके बाहर आएं तो उनके चरणों में लगी गंगा जी की रज पत्थर पर लगे  ।

                                         हमारा इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है । पुरी में भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां बनवा कर प्रतिष्ठित  करवायी थी महान प्रतापी राजा इंद्रद्युम्न ने । भगवान जगन्नाथ के कारण राजा इंद्रद्युम्न ने अपना मालवा का राज पाठ छोड़ा और सब को लेकर पुरूषोत्तम  क्षेत्र पुरी में आ गए । पुरी आज चार धामों में से एक है ।  ' जगन्नाथ  रहस्य '   किताब अगर आप पढ़ेगें तो पायेंगें कि राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना  की थी --- मेरे कुल में कोई  ना रहे ताकि कल किसी को ये अभिमान  ना हो कि ये विशाल और भव्य मंदिर मेरे पुरखों ने बनवाया । देखा जाए तो ये भगवान के प्रति अनन्य  समर्पण है ।

भगवान राजा इंद्रद्युम्न जैसे भक्तों के भाव का आदर ना करते हो ऐसा संभव ही नहीं है । जब तक भगवान जगन्नाथ का नाम रहेगा तब तक राजा इंद्रद्युम्न का नाम भी  रहेगा । भगवान जगन्नाथ उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के विग्रह पुरी के श्री मंदिर में एक तो काठ के बने हैं दूसरे अधूरे हैं । इन विग्रहों का निर्माण राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडीचा के महल में स्वयं देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था । लेकिन रानी गुंडीचा ने विश्वकर्मा की शर्त का पालन नहीं किया इसलिए विश्वकर्मा अधूरे विग्रह छोड़ कर चले गए थे । लेकिन भगवान का भाव  भी देखिए भगवान जगन्नाथ ने राजा से कहा तुम मेरा मंदिर बनवा कर मुझे  इसी रूप में   स्थापित  करो । और भगवान ने राजा को वचन भी दिया कि ---"हर वर्ष मैं तुम्हारे बिंदु सरोवर पर दस दिन के लिए आऊंगा । उन दिनों में तैंतीस करोड़ देवी देवता पुरी में निवास करेंगें सारे तीर्थ भी  यहां निवास करेंगें जो गुंडीचा में मेरे दर्शन करेंगा उसे जन्म मरण से मुक्ति मिल जाएगी  "।
भगवान जगन्नाथ आज तक अपना वचन निभा रहे हैं और निभाते रहेंगें । हर वर्ष आषाढ़ के महीने में वो सुंदर भव्य और विशाल  रथ पर सवार होकर अपने भाई बहन के साथ गुंडीचा मंदिर जाते हैं । रानी   गुंडीचा को भगवान की मौसी का दर्जा दिया जाता है । और यही कहलाती है पुरी की रथ यात्रा जिसे गुंडीचा यात्रा भी कहते हैं। देश विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान की रथ यात्रा देखने आते हैं । भक्त के भाव में समर्पण हो तो भगवान स्वंय चल कर आते हैं ।

जब तक मैं और मेरा का भाव रहेगा तब तक भक्ति खरी नहीं हो सकती ।  जैसा कि महान कवि और संत कबीर ने कहा है -- जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं तो मैं नहीं  । सब जानते हैं कबीर ने हिंदु मुस्लिम दोनों को ही धर्म के दिखावे  पर आड़े हाथों लिया । जितना मुल्ला को कोसा उतना ही पंडित को कोसा । धर्म के प्रति उनकी अरूचि थी ऐसा भी नहीं वो केवल एक कवि नहीं महान योगी और सिद्ध भी थे  तभी  तो उन्होने कहा कि जो  मैं को खत्म कर लेगा वही  परमात्मा को पायेगा ।  मैं हमारे भीतर  का अहम है , गुमान है अपने अस्तित्व  का  । उन्होने जब अपने भीतर के   मैं को मिटाकर परम पिता परमात्मा  की शरण ली होगी तभी तो उनका ये भाव आया---- जब हरि हैं तब मैं नहीं  ।
                       भगवान को किसने कितने किलो सोना चढ़ाया किसने चांदी का विशाल छत्र चढ़ाया ऐसी खबरें टी वी और अखबारों में भी अकसर आती रहती हैं । शिरड़ी के सत्य सांई बाबा के मंदिर और तिरूपति में भगवान वैंकटयेश के मंदिर में किसने क्या चढ़ाया ये खबरे आप अक्सर देखते रहते होंगें । जिनका पहले ही बड़ा नाम और हस्ती है वो भी "मैं " के मोह से नहीं छूट पाते ।  जब वो तिरुपति बाला जी को सोना चांदी  चढ़ाते हैं तो टीवी कैमरे उन्हें फॉलो करते हैं । इस दान और चढ़ावे को गुप्त भी रखा जा सकता है ।
 कहते हैं दांए हाथ से क्या दान किया ये बांए हाथ को भी पता नहीं होना चाहिए ।  

                                                                                               

                                                                               

                                                                                     

                                                     

                         

                 

सोमवार, मई 16

ईश्वर की छाया में आगाह करती सपनों की दुनिया


  एक महीना दस दिन के लंबे अंतराल के बाद आज मैं पोस्ट लिख रही हूं । ये पोस्ट पढ़ कर आप सब जान जायेंगें कि मैं इतने दिन ब्लॉगिंग से दूर क्यों रही । पिछली पोस्ट पांच अप्रैल को लिखी थी जिस पर आपकी बहुत प्रतिक्रियाएं आयीं लेकिन मैं आप को धन्यवाद भी नहीं दे पायी । आशा है आप सब मुझे भूलें  नहीं होंगें । आपके साथ स्नेह की डोर पक्की है । आप जब ये पोस्ट पढ़ेंगें तो मेरी मजबूरी समझ ही लेंगें । आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे यकीन करायेंगी कि मैं अब भी अपने प्यारे से ब्लॉग परिवार की सदस्य हूं --सर्जना शर्मा  


 पिछले महीने नौ अप्रैल को मेरी बड़ी बहन सरीखी सहेली मधु जोशी का फोन आया । मधु बहुत मस्तमौला किस्म की हैं . दिल की बहुत  अच्छी दोस्तों की दोस्त ना किसी से ईष्या ना किसी से द्वेष , कभी मेरा मन किसी बात को लेकर बहुत परेशान होता है तो मधु से ही बात करती हूं और फिर वो ऐसा समझाती हैं कि मन शांत हो जाता है । कहती हैं समय आने पर सब अपनी गति को प्राप्त हो जाते हैं तुम नाहक परेशान मत हुआ करो । और फिर साथ ही मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए कहती हैं --" हम जैसे सीधे सच्चे लोग दुनिया में बहुत कम है . इसलिए लोगों की चालाकियां और दुष्टताएं हमारे दिल को चोट पहुंचाती हैं । लेकिन हम हम रहेंगें और वो वो ही रहेंगें । बस मस्त रहो " । लेकिन उस दिन जब मधु का फोन आया तो उन्होनें सबसे पहला सवाल दागा--- तुम ठीक  तो हो ना ?
 
हां मैं बिल्कुल मस्त और फिट हूं ।
 
नहीं सच बताओ कोई परेशानी तो नहीं, तबियत तो ठीक है ?
 
मधु की आवाज़ में झलकती चिंता और बार बार पूछते रहने पर मुझे हैरानी हुई । हां लेकिन तुम बार बार क्यों ऐसा पूछ रही हो ?
 
"कल रात मुझे सपना आया कि एक भयंकर कुत्ता तुम्हारे उपर झपट रहा है और मैं उसे भगा रही हूं लेकिन वो तुम्हारा पीछा ही नहीं छोड़ रहा है । मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है अपना ख्याल रखना " ।
 
मधु मुझसे बहुत स्नेह रखती हैं हर दुख सुख में साझीदार रहती हैं । हमारे घर की सदस्य जैसी हैं मुझे लगा ऐसे ही उन्हें  कोई सपना आ गया होगा । क्योंकि मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि जिनसे हम बहुत प्यार करते हैं अपने अवचेतन मन में उनकी चिंता करते रहते हैं । शायद मधु की इसी चिंता का परिणाम होगा
लेकिन मधु के फोन के लगभग आधे घंटें बाद मेरे बड़े चाचा जी की बेटा ममता का फोन आया । ममता कभी फोन नहीं करती साल में कभी एक आध बार  या कभी शादी ब्याह और गमी में मिलते हैं ।
ममता का भी पहला सवाल यही था -- दीदी आप ठीक हो ना ?
 
हां मैं बिल्कुल ठीक हूं तुम बताओ तु्म्हारे पति और  बच्चे कैसे हैं ?
 
उसने मेरे सवाल का आधा अधूरा उत्तर दिया और फिर उसकी सुईं भी वहीं अटक गयी - सच बताओ ना आप ठीक हो मुझे दो तीन दिन से आपके बारे में बुरे बुरे सपने आ रहे हैं ?
 
अब मेरे मन में भी थोड़ा सा खटका हुआ कि एक ही  दिन और कुछ ही समय के अंतराल पर दो फोन और वो भी मेरी कुशलता की चिंता को लेकर ।
  लेकिन काम की व्यस्तता और नवरात्र के कारण मैं उनकी बात को भूल सा गई ।
 
11 अप्रैल को कन्या पूजन के समय ना जाने अचानक क्या हुआ कि मेरी पीठ में असहनीय दर्द होने लगा उठना बैठना मुश्किल हो गया और शाम होते होते अस्पताल में दाखिल होने की नौबत आ गयी ।क्योंकि डिस्क स्लिप हो गयी थी ।  जब रात को अस्पताल में बिस्तर पर लेटी तो मधु और ममता के फोन की बात याद आयी । जिसे मैनें उनके मन का वहम समझ कर टाल दिया था तो क्या उन्हें मेरा बीमारी का संकेत पहले ही मिल गया था । उन्होने मुझे सचेत भी किया लेकिन मैं
सपने को सपना ही मानती रही और दो दिन बाद उन दोनों का सपना सच हो गया । और फिर पूरे बीस दिन में बिस्तर पर रही और काफी तकलीफ से गुज़री अब भी कईं घंटे लगातार बैठ नहीं सकती हूं ।
 
                      ऐसे अऩुभव आप सबके भी बहुत रहे होंगें । मुझे भी कईं बार अपने परिजनों को लेकर ऐसे सपने आए और कुछ दिन बाद वही घटनाएं  घटीं । मेरी बहन का बड़ा बेटा कार्तिकेय  तीन  महीने का रहा होगा कि मुझे सपना आया मैं एमसीडी के एक कूड़ा घर के सामने से गुज़र रही हूं ।  कूड़ा घर के बाहर कूड़े के ढ़ेर पर मेरी बहन का बेटा कार्तिकेय पड़ा है । मैने उसे देखा और उठा कर अपने सीने से लगा लिया और घर ले आयी । एक दो महीना गुज़र गया सब ठीक चलता रहा । जब वो पांच महीने का हुआ तो हम उसे लेकर पहली बार अपने घर पंचकूला गए । दिसंबर का महीना था । 
 
एक दो दिन के बाद उसे बुखार उल्टियां और दस्त लग गए । हम स्थानीय डॉक्टर को दिखाते रहे जिसे बहुत काबिल माना जाता था । 
 
लेकिन चार पांच दिन बीत गए हालत सुधरने के बजाए बिगड़ती चली गयी  ।
 
 मेरी बहन की ससुराल भी पास में ही है वो सब लोग भी आते जाते रहे सब बहुत परेशान थे । मेरी बहन के पति सेना में  अफसर हैं उस समय वो नागालैंड में किसी बड़े आपरेशन में लगे थे । फिर सबने फैसला किया कि बच्चे को चंड़ीमंदिर कैंट के कमांड अस्पताल में दाखिल करा देते हैं । अस्पताल में भी कार्तिकेय की हालत में कोई सुधार नहीं आया । और एक दिन शाम के समय उसने आंखों बंद कर ली और शरीर में कोई गति विधि नहीं रही । मैं और मेरी बहन ही उस समय कमरे में थे बाकी सब मेरी बीजी  ,मेरी बहन की सास, सुसर ,नाते रिश्तेदार , पड़ोसी सब बाहर वेटिंग  रूम मैं बैठे थे । हमारी आखिरी उम्मीद टूट गयी मैं और मेरी बहन रोते हुए बाहर आ गए -- हमने कहा वो अब नहीं रहा हमे छोड़ कर चला गया ।
इतने वर्षों के बाद हमारे घर में खुशियां आयी थीं सब बहुत खुश थे पड़ोसी और रिश्ते दार हम से ज्यादा खुश थे सब सन्न रह गए और सब रोने लगे । लेकिन मेरी मां नहीं रोयीं वो वहां से उठ कर चली गयीं ।
 थोड़ी देर बाद वो लौटीं चेहरे पर गम बिल्कुल नहीं और आत्म विश्वास से भरपूर और बोलीं --चलो कार्तिकेय को बड़ा डॉक्टर इमरजैसीं रूम मे लेकर जा रहा है ?
 
 सब रोते रोते चुप हो गए और मेरी बीजी का मुंह देखने लगे । सबने सोचा शायद बहुत   गहरा सदमा लगा है इसलिए बहकी बहकी बातें कर रही हैं । लेकिन उन्होने मेरी बहन का हाथ पकड़ कर खींचा और बोली चलो मेरे साथ । हम सब भागे भागे कार्तिकेय के रूम में गए तो देखा सचमुच डॉक्टर पलटा कार्तिकेय के बेड के पास खड़े थे उन्होनें आक्सीज़न बैगरह सब मंगवा लिया था और उसे बिना समय गंवाएं
 
इमरजैंसी रूम में ले गए । कमरे का दरवाज़ा बंद करने से पहले बोले -- मैं कुछ कह नहीं सकता अगर आज की रात ठीक से  गुज़र गयी तो आपके बच्चे
 को बचा लूंगा बरना कुछ नहीं कह सकता ।
 
 जिसे हम कमरे में ये सोच कर छोड़ आए थे कि इससे हमारा इतना ही नाता था , उसके जीवन की आस दिखने लगे तो कैसा लगता है । ये अनुभव हर वो मां और हर वो दिल कर सकता है  जिसके बच्चे और सगे संबंधी को नया जीवन मिल रहा हो ।
 
अब सबको लगा कि ये तो चमत्कार है । सब भगवान का लाख लाख शुक्र करने लगे कि चलो भगवान ने इतना किया और भी अच्छा करेंगें ।
उधर मेरे पापा जी घर पर बहुत बीमार थे । उन्हें तेज़ बुखार चल रहा था ।  सब ने कार्तिकेय के लिए ना जाने कितनी मन्नतें मांगी और मैं और मेरी बहन कईं दिन से कार्तिकेय के पास बैठ कर हनुमान बाहुक का पाठ कर रहे थे । उस रात भी  हमने सारी रात हनुमान बाहुक ना जाने कितना बार पढ़ा ।मेरी बहन के देवर मुकेश ने भी हम से लेकर हनुमान बाहुक पढ़ी । कहने लगा आप थोड़ा आराम कर लो । लेकिन आंखों में नींद कैसे आती ।
 
सुबह होने को इंतज़ार था ।सुबह पता चला कि कार्तिकेय को आर्मी अस्पताल के नियमों के अनुसार डेंजर लिस्ट पर डाल दिया गया है और पिता को अस्पताल की तरफ से सूचना दे दी गयी है । हमारे मन में चिंता और बढ़ गयी । अगला दिन भी  चिंता में ही बीता । शाम  होते होते डॉक्टर पलटा ने कहा अब आपका बच्चा खतरे बाहर है । और  इसी खबर को सुनने का सबको इंतज़ार था । सब खुश हो गए । उस दिन भगवान की कृपा  का पता चला । भगवान का जितना धन्यवाद देते उतना कम । हनुमान जी के हनुमान बाहुक में इतनी शक्ति है कि निष्प्राण में प्राण डाल दे । उनके प्रति श्रद्धा आज भी इतनी है कि संकट की हर घड़ी में हनुमान जी का ही सहारा रहता है ।
कार्तिकेय की बीमारी की खबर मिलते ही नागालैंड से पहला कूरियर ( सेना के अफसरों जवानों का लाने , ले जाने वाला विशेष विमान ) पकड़ कर उसके पापा भी आ गए हमें खुशी इस बात की थी पिता को आकर खुश खबरी ही सुनने को मिली । और हम कार्तिकेय को घर ले कर आगए । सब खुश थे । इतना खुश कि मैं शब्दों में बयान ही नहीं कर सरकती मैनें पहले भी एक बार लिका था कि हमारा मौहल्ला एक बड़े परिवार की तरह था जिसमें सब सबके लिए थे । किसी एक का गम सबका  गम .,और किसी एक की खुशी सबकी  खुशी . हमने ,कार्तिकेय के दादा    दादी ने जितनी मन्नते मांगी थी उससे ज्यादा हमारे पड़ोसियों ने मांगी थी । किसी ने उसे चप्पलों से तोला तो किसी ने कथा करायी  और किसी ने प्रसाद चढ़ाया । और मेरे पापा को तो सारी कहानी तब बतायीI गयी  जब कार्तिकेय बिल्कुल ठीक हो गया क्योंकि वो दिल के मरीज़ थे शुक्र है कि उन दिनों उन्हें बुखार था और वो अस्पताल नहीं जापाए थे और हमने उनसे सच छुपाए रखा ।सारा संकट टलने के बाद दिमाग को सोचने की फुरसत मिली तो दो महीने पहले आया वो सपना याद आया जिसमें मैं कार्तिकेय को कूड़े के ढ़ेर से उठा कर लायी थी। क्या संकट का संकेत सपने में मुझे पहले ही मिल गया था । फिर भी हम सचेत क्यों नहीं हुए । सपनों की दुनिया केवल सपने नहीं सच्चाई है । और हमें सपनों के संकेत समझने भी चाहिएं । ऐसे मेरे और भी कईं अनुभव हैं जिन्हे मैं आपसे 20 मई को शेयर करूंगीं । लेकिन मन में एक सवाल आया कि डॉक्टर पलटा कार्तिकेय के रूम में पहुंचे कैसे वो तो उनकी विज़िट का समय भी नहीं था । हमने अपनी बीजी से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि डॉक्टर पलटा कार्तिकेय को इमरजैंसी रूम में लेकर जा रहे हैं।
 
 उन्होने बताया कि ,"जब तुम लोगों ने आकर कहा कि वो नहीं रहा तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो बच्चा हमारे घर इतनी मनन्तों मुरादों के बाद आया वो हमें छोड़ कर चला जाएगा । मेरा भगवान इतना कठोर दिल नहीं हो सकता । मुझसे मेरी ये खुशी नहीं छीन सकता । मैं कार्तिकेय के कमरे की तरफ जा रही थी तो कॉरिडोर में दूर से मुझे  डॉक्टर पलटा दिखे और मैं भाग कर उन्हें बुला लायी कि जल्दी चलो मेरे बच्चे में शायद कुछ प्राण बचे हों । और डॉक्टर पलटा मेरे साथ तुरंत आ गए "  । मेरी बीजी को आज भी पूरा विश्वास है कि डॉक्टर पलटा के रूप में भगवान स्वयं कार्तिकेय को जीवनदान देने आए थे ।
और हमें भी यही विश्वास है ।