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सोमवार, मई 16

ईश्वर की छाया में आगाह करती सपनों की दुनिया


  एक महीना दस दिन के लंबे अंतराल के बाद आज मैं पोस्ट लिख रही हूं । ये पोस्ट पढ़ कर आप सब जान जायेंगें कि मैं इतने दिन ब्लॉगिंग से दूर क्यों रही । पिछली पोस्ट पांच अप्रैल को लिखी थी जिस पर आपकी बहुत प्रतिक्रियाएं आयीं लेकिन मैं आप को धन्यवाद भी नहीं दे पायी । आशा है आप सब मुझे भूलें  नहीं होंगें । आपके साथ स्नेह की डोर पक्की है । आप जब ये पोस्ट पढ़ेंगें तो मेरी मजबूरी समझ ही लेंगें । आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे यकीन करायेंगी कि मैं अब भी अपने प्यारे से ब्लॉग परिवार की सदस्य हूं --सर्जना शर्मा  


 पिछले महीने नौ अप्रैल को मेरी बड़ी बहन सरीखी सहेली मधु जोशी का फोन आया । मधु बहुत मस्तमौला किस्म की हैं . दिल की बहुत  अच्छी दोस्तों की दोस्त ना किसी से ईष्या ना किसी से द्वेष , कभी मेरा मन किसी बात को लेकर बहुत परेशान होता है तो मधु से ही बात करती हूं और फिर वो ऐसा समझाती हैं कि मन शांत हो जाता है । कहती हैं समय आने पर सब अपनी गति को प्राप्त हो जाते हैं तुम नाहक परेशान मत हुआ करो । और फिर साथ ही मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए कहती हैं --" हम जैसे सीधे सच्चे लोग दुनिया में बहुत कम है . इसलिए लोगों की चालाकियां और दुष्टताएं हमारे दिल को चोट पहुंचाती हैं । लेकिन हम हम रहेंगें और वो वो ही रहेंगें । बस मस्त रहो " । लेकिन उस दिन जब मधु का फोन आया तो उन्होनें सबसे पहला सवाल दागा--- तुम ठीक  तो हो ना ?
 
हां मैं बिल्कुल मस्त और फिट हूं ।
 
नहीं सच बताओ कोई परेशानी तो नहीं, तबियत तो ठीक है ?
 
मधु की आवाज़ में झलकती चिंता और बार बार पूछते रहने पर मुझे हैरानी हुई । हां लेकिन तुम बार बार क्यों ऐसा पूछ रही हो ?
 
"कल रात मुझे सपना आया कि एक भयंकर कुत्ता तुम्हारे उपर झपट रहा है और मैं उसे भगा रही हूं लेकिन वो तुम्हारा पीछा ही नहीं छोड़ रहा है । मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है अपना ख्याल रखना " ।
 
मधु मुझसे बहुत स्नेह रखती हैं हर दुख सुख में साझीदार रहती हैं । हमारे घर की सदस्य जैसी हैं मुझे लगा ऐसे ही उन्हें  कोई सपना आ गया होगा । क्योंकि मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि जिनसे हम बहुत प्यार करते हैं अपने अवचेतन मन में उनकी चिंता करते रहते हैं । शायद मधु की इसी चिंता का परिणाम होगा
लेकिन मधु के फोन के लगभग आधे घंटें बाद मेरे बड़े चाचा जी की बेटा ममता का फोन आया । ममता कभी फोन नहीं करती साल में कभी एक आध बार  या कभी शादी ब्याह और गमी में मिलते हैं ।
ममता का भी पहला सवाल यही था -- दीदी आप ठीक हो ना ?
 
हां मैं बिल्कुल ठीक हूं तुम बताओ तु्म्हारे पति और  बच्चे कैसे हैं ?
 
उसने मेरे सवाल का आधा अधूरा उत्तर दिया और फिर उसकी सुईं भी वहीं अटक गयी - सच बताओ ना आप ठीक हो मुझे दो तीन दिन से आपके बारे में बुरे बुरे सपने आ रहे हैं ?
 
अब मेरे मन में भी थोड़ा सा खटका हुआ कि एक ही  दिन और कुछ ही समय के अंतराल पर दो फोन और वो भी मेरी कुशलता की चिंता को लेकर ।
  लेकिन काम की व्यस्तता और नवरात्र के कारण मैं उनकी बात को भूल सा गई ।
 
11 अप्रैल को कन्या पूजन के समय ना जाने अचानक क्या हुआ कि मेरी पीठ में असहनीय दर्द होने लगा उठना बैठना मुश्किल हो गया और शाम होते होते अस्पताल में दाखिल होने की नौबत आ गयी ।क्योंकि डिस्क स्लिप हो गयी थी ।  जब रात को अस्पताल में बिस्तर पर लेटी तो मधु और ममता के फोन की बात याद आयी । जिसे मैनें उनके मन का वहम समझ कर टाल दिया था तो क्या उन्हें मेरा बीमारी का संकेत पहले ही मिल गया था । उन्होने मुझे सचेत भी किया लेकिन मैं
सपने को सपना ही मानती रही और दो दिन बाद उन दोनों का सपना सच हो गया । और फिर पूरे बीस दिन में बिस्तर पर रही और काफी तकलीफ से गुज़री अब भी कईं घंटे लगातार बैठ नहीं सकती हूं ।
 
                      ऐसे अऩुभव आप सबके भी बहुत रहे होंगें । मुझे भी कईं बार अपने परिजनों को लेकर ऐसे सपने आए और कुछ दिन बाद वही घटनाएं  घटीं । मेरी बहन का बड़ा बेटा कार्तिकेय  तीन  महीने का रहा होगा कि मुझे सपना आया मैं एमसीडी के एक कूड़ा घर के सामने से गुज़र रही हूं ।  कूड़ा घर के बाहर कूड़े के ढ़ेर पर मेरी बहन का बेटा कार्तिकेय पड़ा है । मैने उसे देखा और उठा कर अपने सीने से लगा लिया और घर ले आयी । एक दो महीना गुज़र गया सब ठीक चलता रहा । जब वो पांच महीने का हुआ तो हम उसे लेकर पहली बार अपने घर पंचकूला गए । दिसंबर का महीना था । 
 
एक दो दिन के बाद उसे बुखार उल्टियां और दस्त लग गए । हम स्थानीय डॉक्टर को दिखाते रहे जिसे बहुत काबिल माना जाता था । 
 
लेकिन चार पांच दिन बीत गए हालत सुधरने के बजाए बिगड़ती चली गयी  ।
 
 मेरी बहन की ससुराल भी पास में ही है वो सब लोग भी आते जाते रहे सब बहुत परेशान थे । मेरी बहन के पति सेना में  अफसर हैं उस समय वो नागालैंड में किसी बड़े आपरेशन में लगे थे । फिर सबने फैसला किया कि बच्चे को चंड़ीमंदिर कैंट के कमांड अस्पताल में दाखिल करा देते हैं । अस्पताल में भी कार्तिकेय की हालत में कोई सुधार नहीं आया । और एक दिन शाम के समय उसने आंखों बंद कर ली और शरीर में कोई गति विधि नहीं रही । मैं और मेरी बहन ही उस समय कमरे में थे बाकी सब मेरी बीजी  ,मेरी बहन की सास, सुसर ,नाते रिश्तेदार , पड़ोसी सब बाहर वेटिंग  रूम मैं बैठे थे । हमारी आखिरी उम्मीद टूट गयी मैं और मेरी बहन रोते हुए बाहर आ गए -- हमने कहा वो अब नहीं रहा हमे छोड़ कर चला गया ।
इतने वर्षों के बाद हमारे घर में खुशियां आयी थीं सब बहुत खुश थे पड़ोसी और रिश्ते दार हम से ज्यादा खुश थे सब सन्न रह गए और सब रोने लगे । लेकिन मेरी मां नहीं रोयीं वो वहां से उठ कर चली गयीं ।
 थोड़ी देर बाद वो लौटीं चेहरे पर गम बिल्कुल नहीं और आत्म विश्वास से भरपूर और बोलीं --चलो कार्तिकेय को बड़ा डॉक्टर इमरजैसीं रूम मे लेकर जा रहा है ?
 
 सब रोते रोते चुप हो गए और मेरी बीजी का मुंह देखने लगे । सबने सोचा शायद बहुत   गहरा सदमा लगा है इसलिए बहकी बहकी बातें कर रही हैं । लेकिन उन्होने मेरी बहन का हाथ पकड़ कर खींचा और बोली चलो मेरे साथ । हम सब भागे भागे कार्तिकेय के रूम में गए तो देखा सचमुच डॉक्टर पलटा कार्तिकेय के बेड के पास खड़े थे उन्होनें आक्सीज़न बैगरह सब मंगवा लिया था और उसे बिना समय गंवाएं
 
इमरजैंसी रूम में ले गए । कमरे का दरवाज़ा बंद करने से पहले बोले -- मैं कुछ कह नहीं सकता अगर आज की रात ठीक से  गुज़र गयी तो आपके बच्चे
 को बचा लूंगा बरना कुछ नहीं कह सकता ।
 
 जिसे हम कमरे में ये सोच कर छोड़ आए थे कि इससे हमारा इतना ही नाता था , उसके जीवन की आस दिखने लगे तो कैसा लगता है । ये अनुभव हर वो मां और हर वो दिल कर सकता है  जिसके बच्चे और सगे संबंधी को नया जीवन मिल रहा हो ।
 
अब सबको लगा कि ये तो चमत्कार है । सब भगवान का लाख लाख शुक्र करने लगे कि चलो भगवान ने इतना किया और भी अच्छा करेंगें ।
उधर मेरे पापा जी घर पर बहुत बीमार थे । उन्हें तेज़ बुखार चल रहा था ।  सब ने कार्तिकेय के लिए ना जाने कितनी मन्नतें मांगी और मैं और मेरी बहन कईं दिन से कार्तिकेय के पास बैठ कर हनुमान बाहुक का पाठ कर रहे थे । उस रात भी  हमने सारी रात हनुमान बाहुक ना जाने कितना बार पढ़ा ।मेरी बहन के देवर मुकेश ने भी हम से लेकर हनुमान बाहुक पढ़ी । कहने लगा आप थोड़ा आराम कर लो । लेकिन आंखों में नींद कैसे आती ।
 
सुबह होने को इंतज़ार था ।सुबह पता चला कि कार्तिकेय को आर्मी अस्पताल के नियमों के अनुसार डेंजर लिस्ट पर डाल दिया गया है और पिता को अस्पताल की तरफ से सूचना दे दी गयी है । हमारे मन में चिंता और बढ़ गयी । अगला दिन भी  चिंता में ही बीता । शाम  होते होते डॉक्टर पलटा ने कहा अब आपका बच्चा खतरे बाहर है । और  इसी खबर को सुनने का सबको इंतज़ार था । सब खुश हो गए । उस दिन भगवान की कृपा  का पता चला । भगवान का जितना धन्यवाद देते उतना कम । हनुमान जी के हनुमान बाहुक में इतनी शक्ति है कि निष्प्राण में प्राण डाल दे । उनके प्रति श्रद्धा आज भी इतनी है कि संकट की हर घड़ी में हनुमान जी का ही सहारा रहता है ।
कार्तिकेय की बीमारी की खबर मिलते ही नागालैंड से पहला कूरियर ( सेना के अफसरों जवानों का लाने , ले जाने वाला विशेष विमान ) पकड़ कर उसके पापा भी आ गए हमें खुशी इस बात की थी पिता को आकर खुश खबरी ही सुनने को मिली । और हम कार्तिकेय को घर ले कर आगए । सब खुश थे । इतना खुश कि मैं शब्दों में बयान ही नहीं कर सरकती मैनें पहले भी एक बार लिका था कि हमारा मौहल्ला एक बड़े परिवार की तरह था जिसमें सब सबके लिए थे । किसी एक का गम सबका  गम .,और किसी एक की खुशी सबकी  खुशी . हमने ,कार्तिकेय के दादा    दादी ने जितनी मन्नते मांगी थी उससे ज्यादा हमारे पड़ोसियों ने मांगी थी । किसी ने उसे चप्पलों से तोला तो किसी ने कथा करायी  और किसी ने प्रसाद चढ़ाया । और मेरे पापा को तो सारी कहानी तब बतायीI गयी  जब कार्तिकेय बिल्कुल ठीक हो गया क्योंकि वो दिल के मरीज़ थे शुक्र है कि उन दिनों उन्हें बुखार था और वो अस्पताल नहीं जापाए थे और हमने उनसे सच छुपाए रखा ।सारा संकट टलने के बाद दिमाग को सोचने की फुरसत मिली तो दो महीने पहले आया वो सपना याद आया जिसमें मैं कार्तिकेय को कूड़े के ढ़ेर से उठा कर लायी थी। क्या संकट का संकेत सपने में मुझे पहले ही मिल गया था । फिर भी हम सचेत क्यों नहीं हुए । सपनों की दुनिया केवल सपने नहीं सच्चाई है । और हमें सपनों के संकेत समझने भी चाहिएं । ऐसे मेरे और भी कईं अनुभव हैं जिन्हे मैं आपसे 20 मई को शेयर करूंगीं । लेकिन मन में एक सवाल आया कि डॉक्टर पलटा कार्तिकेय के रूम में पहुंचे कैसे वो तो उनकी विज़िट का समय भी नहीं था । हमने अपनी बीजी से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि डॉक्टर पलटा कार्तिकेय को इमरजैंसी रूम में लेकर जा रहे हैं।
 
 उन्होने बताया कि ,"जब तुम लोगों ने आकर कहा कि वो नहीं रहा तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो बच्चा हमारे घर इतनी मनन्तों मुरादों के बाद आया वो हमें छोड़ कर चला जाएगा । मेरा भगवान इतना कठोर दिल नहीं हो सकता । मुझसे मेरी ये खुशी नहीं छीन सकता । मैं कार्तिकेय के कमरे की तरफ जा रही थी तो कॉरिडोर में दूर से मुझे  डॉक्टर पलटा दिखे और मैं भाग कर उन्हें बुला लायी कि जल्दी चलो मेरे बच्चे में शायद कुछ प्राण बचे हों । और डॉक्टर पलटा मेरे साथ तुरंत आ गए "  । मेरी बीजी को आज भी पूरा विश्वास है कि डॉक्टर पलटा के रूप में भगवान स्वयं कार्तिकेय को जीवनदान देने आए थे ।
और हमें भी यही विश्वास है ।