योग साधना – भारत की गौरवशाली विधा
श्रुतियों और स्मृतियों में
सांख्य और योग को भारत की ऐसी प्राचीन वैदिक और वेदांत फिलासफी बताया गया है जिसने
पूरी दुनिया को चकित कर दिया । श्रीमद्भगवद्गीता में सांख्य को ज्ञानयोग और
संन्यास योग के नाम से भी बताया गया है । योग को सांख्य का क्रियात्मत्क रूप कहा
गया है । योग विधा का भारत में विकास कैसे हुआ किसने शरीर आत्मा और मन के गूढ़
रहस्यों को समझा सूक्ष्म विवेचन किया । कहा जाता है जो ब्रह्मांड में है वो हमारे
शरीर में भी है ये खोज किसने की । योगदर्शन की रचना किसने की आइए जानते हैं ।
कुरूक्षेत्र की रणभूमि में जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने सामने खड़ी है
। सबके हाथों में अस्त्र और शस्त्र है । रणभेरी बज रही है ऐसे में भगवान कृष्ण अर्जुन
को उसके कर्म का भान कराने के साथ साथ एक
और उपदेश भी देते हैं –
“ हे अर्जुन ! योगी तपस्वियों में
श्रेष्ठ हैं और शास्त्र के ज्ञाता हैं । ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ हैं ,
कर्मकांडियों से भी श्रेष्ठ हैं इसलिए तू योगी बन “ – श्री मद्भगवद्गीता
एक ओर युद्ध में पराक्रम दिखाने का उपदेश और दूसरी ओर योगी बनने की सलाह भी ।
इसका अर्थ ये हुआ कि योग आदि काल से चली आ रही श्रेष्ठ विधा है योगी बन कर व्यक्ति
परम पद पा लेता है ।
तब अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछते हैं --- “हे योगेश्वर ! यह योगकौशल वही है जिसे
भगवान हिरण्यगर्भ ने कहा था “।
ये सिद्ध करता है कि योगकौशल के रचियता हिरण्यगर्भ थे । योगदर्शन के सूत्रकार
महान ऋषि पतंजलि मुनि थे । आज 21 वीं सदी में पतंजलि ऋषि योग के पर्याय हैं । लेकिन उन्होने हिरण्यगर्भ
के सूत्रों के आधार पर योग दर्शन की रचना की । याज्ञवल्क्य में लिखा गया है – “ हिरण्यगर्भ ही योग के
वक्ता है इनसे पुरातन और कोई वक्ता नहीं है “।
हिरण्यगर्भ को ही याज्ञवल्क्य ऋषि ने योग का आदि गुरू और वक्ता माना है ।
हिरण्यगर्भ का वर्णन ऋग्वेद , यजुर्वेद ,छोन्दोपनिषद और
महाभारत में कहा गया है --
---“ यह प्रकाशमान हिरण्यगर्भ वही हैं जिनकी वेदों में स्तुति की गयी है । इनकी
योगी लोग नित्यपूजा किया करते हैं और संसार में इन्हें विभु कहते हैं “
श्रीपतंजलि ऋषि योगदर्शन ग्रंथ का आरंभ--- अथ योगानुशासनम् से करते हैं । जिससे ये
स्पष्ट होता है कि योग का शासन पहले से ही था । यहां शासन का अर्थ उपदेश या शिक्षा
है । अनुशासन यानि जिस विषय का शासन पहले
से ही है । उन्होने भी इसे प्राचीन परंपरा से चला आना बताया है ।
महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन को चार पादों और 195 सूत्रों में बांटा ।
पहला समाधिपाद दूसरा साधनपाद
तीसरा विभूतिपाद और चौथा कैवल्यपाद ।
समाधिपाद में 51 साधनापाद में 55 विभूतिपाद में 55 और सूत्र हैं कैवल्यपाद में 34 सूत्र हैं ।
योग को पूर्णरूप से जीवन में अपनाना साधारण लोगों के लिए संभव नहीं है । जैसा
कि अब तक जो हम ने समझा और आपको बताया उससे आप
भी अनुमान लगा सकते हैं कि योग की ऊंची अवस्था को प्राप्त करना आसान नहीं
है । योग के महर्षि पतंजलि ने आठ अंग बताए हैं जिनमें यम ,नियम, आसन, प्राणायाम ,प्रत्याहार
, धारणा , ध्यान और आठवां और अंतिम अंग
समाधि है
योगदर्शन के सूत्रकार
महर्षि पतंजलि महान ऋषि और सिद्ध योगी कपिल मुनि के बाद और और पाणिनि और चरक ऋषि
से पहले हुए हैं । हज़ारों वर्ष पहले पतंजलि ऋषि ने योग दर्शन के सूत्रों को
संजोया वो दर्शन आज के युग में भी देश विदेश में अपनी धाक जमाए हुए है । अब ज्यादा
से ज्यादा लोग योग अपना कर अपने तन और मन को साध रहे हैं । इस प्राचीन विधा को अब
फिर से लोकप्रिय बनाने का श्रेय योगगुरू बाबा रामदेव को जाता है । उन्होने योग को
घर घर तक पहुंचाया एक साधारण व्यक्ति से लेकर देश विदेश की महान हस्तियों को योग
का अभ्यास करने की प्रेरणा दी । अब भारत के प्राचीन ज्ञान की ज्योति संयुक्त
राष्ट्र संघ तक पहुंच गयी है ।
gyanvardhak
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