मंगलवार, जून 2

THE HOSTILE CITY CHENNAI

हर शहर का एक मिजाज़ होता है उसके लोग, उसकी फितरत , उसके कूचे उसकी गलियां उसे एक पहचान देते हैं । जैसे दिल वालों की दिल्ली , सपनों की नगरी या कहें तो माया नगरी मुंबई , सिटी ऑफ जॉय कोलकाता इन तीन मैट्रों शहरों का ये नाम जमता भी है लेकिन चौथे मेट्रो शहर चैन्नई को क्या नाम दूं । अपने अनुभव के आधार पर नाम दे दूं शायद बहुत से लोग नाराज़ हो जाएंगें । लेकिन यकीन मानिए पहली बार मैं चैन्नई गयी और वहां के तमिलों के व्यवहार से हैरान परेशान हो गयी । एयरपोर्ट कर्मचारी , टैक्सीवाला , चार्टेड बस का स्टॉफ , दुकानदार सब इतने उग्र ,इतने रूखे, इतने चिड़चिड़े , चिल्ला चिल्ला कर बात करना ,गंदी गंदी भाव भगिंमाएं हाव भाव में तिरस्कार साफ झलकता है । 

कितना भी बोलो no tamil no tamil फिर भी लगातार तमिल बोलना जैसे उनकी शान ही नहीं उनके मान और सम्मान का विषय है । ओला टैक्सी के स्टॉफ के साथ जो दो घंटे माथा पच्ची करनी पड़ी उससे सिर में दर्द हो गया । उत्तर भारतीयों के प्रति इतना रूखापन इतना बेगानापन मैनें आजतक किसी और शहर में नहीं देखा । यही तमिल जब दिल्ली आते हैं तो दिल्ली बांहें पसार कर इनका स्वागत करती है इन्हें अपनाती है । और यहां आकर ये दो दिन में हिंदी बोलते भी हैं समझते भी हैं फिर चाहे वो घर में काम करने वाली बाई हो या ऊंचे ओहदे पर कोई अफसर .। 

यहां मैं एक बात साफ करना चाहूंगी कि जिनसे आपके व्यक्तिगत संबंध हैं उन तमिलों का स्वभाव अलग है औऱ बातचीत का लहजा भी । लेकिन आम आदमी से पाला पड़ा तो मुझे डर ही लगने लगा कि जिस तरह से बात कर रहें हैं नोच ही डालेंगें । भला हो HITESH JAIN का जिन्होनें मेरा फेस बुक स्टेटस देखते ही मुझे फोन किया . 22 मई को जब हम श्री लंका जा रहे तो मैनें फेसबुक स्टेटस अपडेट किया था । हितेश ने जैसे ही देखा मुझे फोन किया और अपने धऱ आने का न्योता दिया । तो मैनें कहा वापसी में तीन दिन चैन्नई रूकना है तब फोन करूंगी । हितेश के पूरे परिवार से मेरे सात साल पुराने संबंध हैं ये मारवाड़ी परिवार चैन्नई का नामी बिजनेस परिवार है । सोचती हूं अगर ये परिवार ना होता तो चैन्नई में तीन दिन काटना कितना मुश्किल हो जाता । 

चैन्नई के अनुभव से मन में सवाल उठ रहे हैं क्या सचमुच केरल से कन्या कुमारी और गोहाटी से चौपाटी तक सारा भारत एक है । चैन्नई जा कर वहां के लोगों के HOSTILE ATTITUDE से तो ऐसा नहीं लगता । जितने रूखे यहां के स्थानीय लोग हैं उतना ही रूखा सा ये शहर देखने में भी लगता है पूरे शहर में मुश्किल से हरियाली दिखायी देती है ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे २० -२५ साल पहले का भी अनुभव कुछ ऐसा ही है ...यानि कुछ नहीं बदला इन सालों में, कुछ भी नहीं.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (04-06-2015) को "हम भारतीयों का डी एन ए - दिल का अजीब रिश्ता" (चर्चा अंक-1996) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. रूप चंद्र शास्त्री जी नमस्कार आप कैसे हैं आशा हैं स्वस्थ सानंद होंगें . चर्चा मंच के लिए चुनने के लिए आभार । आपका स्नेह सदा मुझ पर रहता है और सदा बने रहे यही कामना है ।

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  4. शिखा मैं पहली बार चैन्नई गयी लगा कहां आ गयी यदि मेरा परिचित मारवाड़ी परिवार ना होता तो शायद मैं रो ही देती । ऐसे शहर में समय काटना कितना मुश्किल है

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