सोमवार, मई 16

ईश्वर की छाया में आगाह करती सपनों की दुनिया


  एक महीना दस दिन के लंबे अंतराल के बाद आज मैं पोस्ट लिख रही हूं । ये पोस्ट पढ़ कर आप सब जान जायेंगें कि मैं इतने दिन ब्लॉगिंग से दूर क्यों रही । पिछली पोस्ट पांच अप्रैल को लिखी थी जिस पर आपकी बहुत प्रतिक्रियाएं आयीं लेकिन मैं आप को धन्यवाद भी नहीं दे पायी । आशा है आप सब मुझे भूलें  नहीं होंगें । आपके साथ स्नेह की डोर पक्की है । आप जब ये पोस्ट पढ़ेंगें तो मेरी मजबूरी समझ ही लेंगें । आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे यकीन करायेंगी कि मैं अब भी अपने प्यारे से ब्लॉग परिवार की सदस्य हूं --सर्जना शर्मा  


 पिछले महीने नौ अप्रैल को मेरी बड़ी बहन सरीखी सहेली मधु जोशी का फोन आया । मधु बहुत मस्तमौला किस्म की हैं . दिल की बहुत  अच्छी दोस्तों की दोस्त ना किसी से ईष्या ना किसी से द्वेष , कभी मेरा मन किसी बात को लेकर बहुत परेशान होता है तो मधु से ही बात करती हूं और फिर वो ऐसा समझाती हैं कि मन शांत हो जाता है । कहती हैं समय आने पर सब अपनी गति को प्राप्त हो जाते हैं तुम नाहक परेशान मत हुआ करो । और फिर साथ ही मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए कहती हैं --" हम जैसे सीधे सच्चे लोग दुनिया में बहुत कम है . इसलिए लोगों की चालाकियां और दुष्टताएं हमारे दिल को चोट पहुंचाती हैं । लेकिन हम हम रहेंगें और वो वो ही रहेंगें । बस मस्त रहो " । लेकिन उस दिन जब मधु का फोन आया तो उन्होनें सबसे पहला सवाल दागा--- तुम ठीक  तो हो ना ?
 
हां मैं बिल्कुल मस्त और फिट हूं ।
 
नहीं सच बताओ कोई परेशानी तो नहीं, तबियत तो ठीक है ?
 
मधु की आवाज़ में झलकती चिंता और बार बार पूछते रहने पर मुझे हैरानी हुई । हां लेकिन तुम बार बार क्यों ऐसा पूछ रही हो ?
 
"कल रात मुझे सपना आया कि एक भयंकर कुत्ता तुम्हारे उपर झपट रहा है और मैं उसे भगा रही हूं लेकिन वो तुम्हारा पीछा ही नहीं छोड़ रहा है । मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है अपना ख्याल रखना " ।
 
मधु मुझसे बहुत स्नेह रखती हैं हर दुख सुख में साझीदार रहती हैं । हमारे घर की सदस्य जैसी हैं मुझे लगा ऐसे ही उन्हें  कोई सपना आ गया होगा । क्योंकि मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि जिनसे हम बहुत प्यार करते हैं अपने अवचेतन मन में उनकी चिंता करते रहते हैं । शायद मधु की इसी चिंता का परिणाम होगा
लेकिन मधु के फोन के लगभग आधे घंटें बाद मेरे बड़े चाचा जी की बेटा ममता का फोन आया । ममता कभी फोन नहीं करती साल में कभी एक आध बार  या कभी शादी ब्याह और गमी में मिलते हैं ।
ममता का भी पहला सवाल यही था -- दीदी आप ठीक हो ना ?
 
हां मैं बिल्कुल ठीक हूं तुम बताओ तु्म्हारे पति और  बच्चे कैसे हैं ?
 
उसने मेरे सवाल का आधा अधूरा उत्तर दिया और फिर उसकी सुईं भी वहीं अटक गयी - सच बताओ ना आप ठीक हो मुझे दो तीन दिन से आपके बारे में बुरे बुरे सपने आ रहे हैं ?
 
अब मेरे मन में भी थोड़ा सा खटका हुआ कि एक ही  दिन और कुछ ही समय के अंतराल पर दो फोन और वो भी मेरी कुशलता की चिंता को लेकर ।
  लेकिन काम की व्यस्तता और नवरात्र के कारण मैं उनकी बात को भूल सा गई ।
 
11 अप्रैल को कन्या पूजन के समय ना जाने अचानक क्या हुआ कि मेरी पीठ में असहनीय दर्द होने लगा उठना बैठना मुश्किल हो गया और शाम होते होते अस्पताल में दाखिल होने की नौबत आ गयी ।क्योंकि डिस्क स्लिप हो गयी थी ।  जब रात को अस्पताल में बिस्तर पर लेटी तो मधु और ममता के फोन की बात याद आयी । जिसे मैनें उनके मन का वहम समझ कर टाल दिया था तो क्या उन्हें मेरा बीमारी का संकेत पहले ही मिल गया था । उन्होने मुझे सचेत भी किया लेकिन मैं
सपने को सपना ही मानती रही और दो दिन बाद उन दोनों का सपना सच हो गया । और फिर पूरे बीस दिन में बिस्तर पर रही और काफी तकलीफ से गुज़री अब भी कईं घंटे लगातार बैठ नहीं सकती हूं ।
 
                      ऐसे अऩुभव आप सबके भी बहुत रहे होंगें । मुझे भी कईं बार अपने परिजनों को लेकर ऐसे सपने आए और कुछ दिन बाद वही घटनाएं  घटीं । मेरी बहन का बड़ा बेटा कार्तिकेय  तीन  महीने का रहा होगा कि मुझे सपना आया मैं एमसीडी के एक कूड़ा घर के सामने से गुज़र रही हूं ।  कूड़ा घर के बाहर कूड़े के ढ़ेर पर मेरी बहन का बेटा कार्तिकेय पड़ा है । मैने उसे देखा और उठा कर अपने सीने से लगा लिया और घर ले आयी । एक दो महीना गुज़र गया सब ठीक चलता रहा । जब वो पांच महीने का हुआ तो हम उसे लेकर पहली बार अपने घर पंचकूला गए । दिसंबर का महीना था । 
 
एक दो दिन के बाद उसे बुखार उल्टियां और दस्त लग गए । हम स्थानीय डॉक्टर को दिखाते रहे जिसे बहुत काबिल माना जाता था । 
 
लेकिन चार पांच दिन बीत गए हालत सुधरने के बजाए बिगड़ती चली गयी  ।
 
 मेरी बहन की ससुराल भी पास में ही है वो सब लोग भी आते जाते रहे सब बहुत परेशान थे । मेरी बहन के पति सेना में  अफसर हैं उस समय वो नागालैंड में किसी बड़े आपरेशन में लगे थे । फिर सबने फैसला किया कि बच्चे को चंड़ीमंदिर कैंट के कमांड अस्पताल में दाखिल करा देते हैं । अस्पताल में भी कार्तिकेय की हालत में कोई सुधार नहीं आया । और एक दिन शाम के समय उसने आंखों बंद कर ली और शरीर में कोई गति विधि नहीं रही । मैं और मेरी बहन ही उस समय कमरे में थे बाकी सब मेरी बीजी  ,मेरी बहन की सास, सुसर ,नाते रिश्तेदार , पड़ोसी सब बाहर वेटिंग  रूम मैं बैठे थे । हमारी आखिरी उम्मीद टूट गयी मैं और मेरी बहन रोते हुए बाहर आ गए -- हमने कहा वो अब नहीं रहा हमे छोड़ कर चला गया ।
इतने वर्षों के बाद हमारे घर में खुशियां आयी थीं सब बहुत खुश थे पड़ोसी और रिश्ते दार हम से ज्यादा खुश थे सब सन्न रह गए और सब रोने लगे । लेकिन मेरी मां नहीं रोयीं वो वहां से उठ कर चली गयीं ।
 थोड़ी देर बाद वो लौटीं चेहरे पर गम बिल्कुल नहीं और आत्म विश्वास से भरपूर और बोलीं --चलो कार्तिकेय को बड़ा डॉक्टर इमरजैसीं रूम मे लेकर जा रहा है ?
 
 सब रोते रोते चुप हो गए और मेरी बीजी का मुंह देखने लगे । सबने सोचा शायद बहुत   गहरा सदमा लगा है इसलिए बहकी बहकी बातें कर रही हैं । लेकिन उन्होने मेरी बहन का हाथ पकड़ कर खींचा और बोली चलो मेरे साथ । हम सब भागे भागे कार्तिकेय के रूम में गए तो देखा सचमुच डॉक्टर पलटा कार्तिकेय के बेड के पास खड़े थे उन्होनें आक्सीज़न बैगरह सब मंगवा लिया था और उसे बिना समय गंवाएं
 
इमरजैंसी रूम में ले गए । कमरे का दरवाज़ा बंद करने से पहले बोले -- मैं कुछ कह नहीं सकता अगर आज की रात ठीक से  गुज़र गयी तो आपके बच्चे
 को बचा लूंगा बरना कुछ नहीं कह सकता ।
 
 जिसे हम कमरे में ये सोच कर छोड़ आए थे कि इससे हमारा इतना ही नाता था , उसके जीवन की आस दिखने लगे तो कैसा लगता है । ये अनुभव हर वो मां और हर वो दिल कर सकता है  जिसके बच्चे और सगे संबंधी को नया जीवन मिल रहा हो ।
 
अब सबको लगा कि ये तो चमत्कार है । सब भगवान का लाख लाख शुक्र करने लगे कि चलो भगवान ने इतना किया और भी अच्छा करेंगें ।
उधर मेरे पापा जी घर पर बहुत बीमार थे । उन्हें तेज़ बुखार चल रहा था ।  सब ने कार्तिकेय के लिए ना जाने कितनी मन्नतें मांगी और मैं और मेरी बहन कईं दिन से कार्तिकेय के पास बैठ कर हनुमान बाहुक का पाठ कर रहे थे । उस रात भी  हमने सारी रात हनुमान बाहुक ना जाने कितना बार पढ़ा ।मेरी बहन के देवर मुकेश ने भी हम से लेकर हनुमान बाहुक पढ़ी । कहने लगा आप थोड़ा आराम कर लो । लेकिन आंखों में नींद कैसे आती ।
 
सुबह होने को इंतज़ार था ।सुबह पता चला कि कार्तिकेय को आर्मी अस्पताल के नियमों के अनुसार डेंजर लिस्ट पर डाल दिया गया है और पिता को अस्पताल की तरफ से सूचना दे दी गयी है । हमारे मन में चिंता और बढ़ गयी । अगला दिन भी  चिंता में ही बीता । शाम  होते होते डॉक्टर पलटा ने कहा अब आपका बच्चा खतरे बाहर है । और  इसी खबर को सुनने का सबको इंतज़ार था । सब खुश हो गए । उस दिन भगवान की कृपा  का पता चला । भगवान का जितना धन्यवाद देते उतना कम । हनुमान जी के हनुमान बाहुक में इतनी शक्ति है कि निष्प्राण में प्राण डाल दे । उनके प्रति श्रद्धा आज भी इतनी है कि संकट की हर घड़ी में हनुमान जी का ही सहारा रहता है ।
कार्तिकेय की बीमारी की खबर मिलते ही नागालैंड से पहला कूरियर ( सेना के अफसरों जवानों का लाने , ले जाने वाला विशेष विमान ) पकड़ कर उसके पापा भी आ गए हमें खुशी इस बात की थी पिता को आकर खुश खबरी ही सुनने को मिली । और हम कार्तिकेय को घर ले कर आगए । सब खुश थे । इतना खुश कि मैं शब्दों में बयान ही नहीं कर सरकती मैनें पहले भी एक बार लिका था कि हमारा मौहल्ला एक बड़े परिवार की तरह था जिसमें सब सबके लिए थे । किसी एक का गम सबका  गम .,और किसी एक की खुशी सबकी  खुशी . हमने ,कार्तिकेय के दादा    दादी ने जितनी मन्नते मांगी थी उससे ज्यादा हमारे पड़ोसियों ने मांगी थी । किसी ने उसे चप्पलों से तोला तो किसी ने कथा करायी  और किसी ने प्रसाद चढ़ाया । और मेरे पापा को तो सारी कहानी तब बतायीI गयी  जब कार्तिकेय बिल्कुल ठीक हो गया क्योंकि वो दिल के मरीज़ थे शुक्र है कि उन दिनों उन्हें बुखार था और वो अस्पताल नहीं जापाए थे और हमने उनसे सच छुपाए रखा ।सारा संकट टलने के बाद दिमाग को सोचने की फुरसत मिली तो दो महीने पहले आया वो सपना याद आया जिसमें मैं कार्तिकेय को कूड़े के ढ़ेर से उठा कर लायी थी। क्या संकट का संकेत सपने में मुझे पहले ही मिल गया था । फिर भी हम सचेत क्यों नहीं हुए । सपनों की दुनिया केवल सपने नहीं सच्चाई है । और हमें सपनों के संकेत समझने भी चाहिएं । ऐसे मेरे और भी कईं अनुभव हैं जिन्हे मैं आपसे 20 मई को शेयर करूंगीं । लेकिन मन में एक सवाल आया कि डॉक्टर पलटा कार्तिकेय के रूम में पहुंचे कैसे वो तो उनकी विज़िट का समय भी नहीं था । हमने अपनी बीजी से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि डॉक्टर पलटा कार्तिकेय को इमरजैंसी रूम में लेकर जा रहे हैं।
 
 उन्होने बताया कि ,"जब तुम लोगों ने आकर कहा कि वो नहीं रहा तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो बच्चा हमारे घर इतनी मनन्तों मुरादों के बाद आया वो हमें छोड़ कर चला जाएगा । मेरा भगवान इतना कठोर दिल नहीं हो सकता । मुझसे मेरी ये खुशी नहीं छीन सकता । मैं कार्तिकेय के कमरे की तरफ जा रही थी तो कॉरिडोर में दूर से मुझे  डॉक्टर पलटा दिखे और मैं भाग कर उन्हें बुला लायी कि जल्दी चलो मेरे बच्चे में शायद कुछ प्राण बचे हों । और डॉक्टर पलटा मेरे साथ तुरंत आ गए "  । मेरी बीजी को आज भी पूरा विश्वास है कि डॉक्टर पलटा के रूप में भगवान स्वयं कार्तिकेय को जीवनदान देने आए थे ।
और हमें भी यही विश्वास है ।
     

 

मंगलवार, अप्रैल 5

दलालो की गिरफ्त में देवी मां

सर्जना शर्मा

सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार ,
 नव संवत्सर और नवरात्र की शुभ कामनाएं बहुत दिन से ब्लॉग पर जाने का समय ही नहीं मिला।
आप सबकी होली की शुभकामनाओं का जवाब नहीं दे पायी आप सब से क्षमा चाहती हूं।
मैं चैतन्य महाप्रभु की जन्म स्थली और इस्कॉन के हेडक्वार्टर मायापुर गयी थी। वहां से आकर स्टोरी बनाने में व्यस्त रही। मायापुर पर विस्तृत रिपोर्ट बाद में पहले एक अनुभव काली देवी के दर्शन के समय का।
 कोलकाता के काली घाट पर जैसे ही हमारी टैक्सी रूकी माथे पर तिलक लगाए बहुत से युवा हमारा तरफ लपके। हम आपको काली मां के दर्शन करायेंगें। नहीं हम स्वयं दर्शन कर लेंगें आपकी ज़रूरत नहीं है। मैनें उनसे पल्ला छुड़ाना चाहा। नहीं दीदी केवल 21 रूपए दिजिए। मुझे मेरी सहयोगी सीमा पहले ही अलर्ट कर चुकी थी कि काली मां के दर्शन करने जाओ तो किसी दलाल के चक्कर में मत पड़ना। सीमा ने मुझसे एक दिन पहले दर्शन किए थे और वो इनके जाल में फसंने की पूरी कहानी मुझे सुना कर सचेत कर चुकी थी। मैनें कहा बिल्कुल नहीं अब 21 रूपए कि बात कर फिर ज्यादा मांगोगे। नहीं दीदी काली मां की कसम। अच्छा ठीक है चलो। उनमें से एक हमें एक प्रसाद की दुकान पर ले गया बोला चप्पल जूता यहीं उतार दिजिए और प्रसाद और चढ़ावे की टोकरी भी लगे हाथ ले आया। अब उसने हमें एक दूसरे युवक के हवाले कर दिया कि आपको ये दर्शन करायेगा। मेरे साथ इस्कॉन के राष्ट्रीय संपर्क निदेशक वीएन दास थे ।
 युवक हमें काली देवी के गृभगृह के सामने बने हॉल में ले गया। वहां एक बूढ़ा सा पुजारी बैठा था। उसने पूजा की टोकरी से नारियल चुनरी सिंगार का सामान निकाल लिया और मिठाई का डिब्बा और हार रहने दिया। और वो बिहारी युवक हमें बताता रहा कि होली के बाद का पहला मंगलवार है आज मां का राज्याभिषेक है आज मां के वस्त्र आपको मिल जाएं तो बहुत शुभ होगा। उसकी किसी बात का जवाब दिए बिना हम आगे बढे। लाईन तोड़ कर वो हमें आगे ले गया वहां भी बहुत धक्का मुक्की थी। अब उसने टोकरी मेरे हाथ में पकड़ा दी और स्वयं थोड़ा पीछे खड़ा हो गया। पुजारी ने कहा मां को चढ़ावा चढ़ाओं मैनें टोकरी में 211 रूपए रखे थे लेकिन वो टोकरी में दिख ही नहीं रहे थे। मैनें उस युवक से पूछा चढ़ावा कहां है उसने कहा टोकरी में ही है लेकिन दिखा नहीं पुजारी ने जब शोर मचाया तो उसने कहा प्रसाद के डिब्बे में। मैने डिब्बा खोल कर देखा तो उसने पैसे मिठाई के नीचे  दबा रखे थे। खैर वो मैनें चढ़ा दिए तो पुजारी ने फिर भी जिद की कि मंदिर की थाली में मैं कुछ और पैसे चढ़ाऊं। देवी मां को ही चढ़ाना है ये सोच कर मैनें कुछ और रूपए निकाले लेकिन पुजारी ने कहा 1100 रूपए चढ़ाओ। चढ़ावा श्रद्धा से होता है जितना मैं चढ़ाना चाहती थी उतना ही चढ़ा दिया।
काली मां के दर्शन कर हम बाहर निकले, वो बिहारी युवक हमें फिर से हॉल में ले गया। वीएन दास जी को उसने कहा कि आप पीछे ही  रूकें  और बूढ़ा पुजारी  मुझे एक तरफ ले गया। दोनों ने दुर्गासप्तशती का श्लोक जयंती मंगला काली ---- मुझ से बुलवाना शुरू किया। लेकिन गलत शलत बोले चले जा रहे थे। मैनें उन दोनों को कहा कि आप प्लीज़ अपना मंत्र बंद करें मुझे ये मंत्र आता है मैं स्वंय जाप कर लूंगीं। खैर बूढ़े ने नारियल तोड़ा , जोत जलवायी और अपनी जेब से निकाल कर एक शेशे मुझे देने लगा जिसमें कुछ सिंदूर , एक रूपया और चुनरी का एक निहायत छोटा सा पीस था। कहने लगा ये मां के राज्याभिषेक का वस्त्र है आपके घर में खुशहाली आयेगी आप राज करोगे हर मनोकामना पूरी होगी। इसके लिए 1100 रूपए दिजिए। अब मुझे उस युवक के निरंतर ये बताने का अर्थ समझ आ गया कि बार बार राज्याभिषेक की बात क्यों कर रहा था। मैनें वो शेशे बूढे को तुरंत वापस कर दिया कहा--' मुझे नहीं चाहिए आप रख लें।'  दोनों को ऐसी उम्मीद नहीं थी पहले तो मैनें मंत्र स्वयं पढ़ लिया दूसरे उनका शेशे वापस कर दिया। अब वो थोड़ा सकपका गए लेकिन बोले कि अरे मैडम ये हमें  थोड़ा  ना दे रही हैं देवी मां को दे ऱही हैं। अब मैनें थोड़ा कड़क हो कर कहा--' जितने दे रही हूं उतने पैसे ले लो वरना जाने दो '। मैनें बूढ़े को सौ रूपए दिए बूढ़े ने चुपचाप लिए और खिसक गया। वीएन दास जी को उन्होने जान बूझ कर अलग खड़ा रखा था शायद वो समझते हैं कि महिलाओं को फुसलाना आसान होता है।
मैनें उस युवक को डांटा कि-- क्या तुम्हारा नेटवर्क चलता है ?
नहीं नहीं दीदी कैसी बात कर रही हो मैं तो इन्हें जानता भी  नहीं बस जो सामने आ जाए उसी से पूजा करा देता हूं।
खैर.. मैं उसका खेल समझ गयी थी। अब वो हमें बाहर उसी दुकान पर लाया जहां उसका साथी हमें फंसा कर लाया था। मैनें 21 रूपए निकाले उसे देने के लिए क्योंकि इतने में ही तय हुआ था। अब तो वो फैल गया इतने में क्या होता है 200 रूपए तो मैं बाहर गेट पर प्रति दर्शानर्थी देता। मैनें पचास रूपए निकाले उसे दिए उसने मुझे वापस कर दिए। मैनें कहा ठीक है लाओ दो लेने हैं तो ले वरना छोड़ दो। अब वो बदतमीजी पर उतर आया। मैनें प्रसाद वापस मांगा क्योंकि टोकरी उसीके पास थी तो बोला उनसे लो मैने देखा एक महिला हाथ में प्रसाद की थैली  लिए खड़ी थी। वो भी पैसे मांगने लगी 500 रूपए दो। अब तो मुझे बहुत गुस्सा आया अब  पूरे रैकेट का नया किरदार कौन है मैंने सोचा और उससे पूछा--' क्यों अब ये कौन है तुम ले गए थे या ये ले गयी थी मुझे नहीं चाहिए प्रसाद रखो अपने पास '। अब अच्छा खासा तमाशा बनता जा रहा था।
मैनें धमकी दी कि मुंह पर दो थप्पड दूंगी और पुलिस को बुला रही हूं। अब जिसकी दुकान थी वो समझ गया कि मामला बिगड़ सकता है । उसने बिहारी युवक को डांट लगायी। अब वो भी सामने आ गया जो हमें फंसा कर लाया था। मैनें उससे कहा ये क्या तमाशा है। खैर किसी तरह सौ रूपए में उनसे पीछा छूटा। लेकिन मां काली के दर्शन कराने वाले दलालों का एक बड़ा नेटवर्क हैं। पूरी कहानी से आप भी समझ गए होंगें कि दुकानदारों , पुजारियों  और दलालों का एक बड़ा नेट वर्क है काली मंदिर के बाहर।
              इतना ही नहीं कोलकाता के भिखारी भीख भी धौंस के साथ मांगते हैं और फिर लड़ाई भी करते हैं। भिखारियों का एक पूरा झुंड पीछे पीछे चलता है। सबने कहा दाल भात के लिए पैसे दो। मैनें कहा कुछ खा लो मैं खिला देती हूं। मैने रस के बड़े पैकेट लिए और बांटने शुरू किए उनमें से कुछ विद्रोह पर उतर आए बिल्कुल माकपा कार्यकर्ताओं के जैसे तेवर थे। एक भिखारी मुझे हड़काता रहा मैनें उसे रस दिए तो उसने मुझे वापस कर दिए मैनें उससे लेकर दूसरी भिखारिन को दे दिए। लेकिन वो वहीं खड़ा रहा। जब उसने देखा कि मैं सचमुच उसे कुछ नहीं देने वाली तो वो आगे आया मुझे भी दो। 'तुम्हें तो चाहिए ही नहीं फिर क्यों दूं ?" उसने कहा पूरी थैली मुझे दे दो यानि जितने बचे हैं वो सब चाहिएं। उसने लगभग मेरे हाथ से छीन लिए।
                जैसे तैसे पीछा छुड़ाकर टैक्सी पकड़ी। वीएन दास जी और मैं आपस में बात कर रहे थे तो टैक्सी  वाला बोला अरे दीदी काली मां के दर्शन करना बाहर के लोगों के लिए दूभर हो गया है। स्थानीय लोग तो इनकी पकड़ में आते नहीं। उसने बताया पिछले दिनों दिल्ली का एक अमीर सेठ आया था इन्होने  उसका पर्स , चेन , मोबाइल सब छीन लिया उसने पुलिस को रिपोर्ट लिखाई तब कहीं जाकर उसका सामान वापस मिला ।
              यहां तो पुलिस चौकी है फिर पुलिस दर्शन करने वालों की मदद क्यों नहीं करती?  टैक्सी वाला स्थानीय बंगाली था। उसने कहा --- सब तो बांग्लादेशी है दलालों से मिले हुए हैं। इन सबको ज्योति दा ने भर्ती किया क्योंकि वो स्वयं भी प्रवासी बंगाली है। उसके कहने का शायद ये अर्थ था कि विभाजन के समय बांग्लादेश से आए बंगालियों को ही ज्योति दा ने थोक के भाव नौकरी दी।
                  अब आप ही बताएं कि जिस शक्ति पीठ पर इंसान मन में गहरी आस्था ले कर जाता है और वहां दलालों का पूरा नेटवर्क चल रहा हो तो दिल कैसा हो जाता है। अपने धर्म स्थानों की शुचिता और पवित्रता बनायी रखनी है तो ऐसे नेटवर्क खत्म होना ज़रूरी है। मंदिर प्रबंधन और पुलिस ही कारगर कदम उठा सकती है।  


मंगलवार, मार्च 1

कैलास पर्वत से धरती तक की यात्रा

 महाशिवरात्रि पर हिमाचल प्रदेश के गद्दियों का शिव स्त्रोत---
द्वापर युग में जब भगवान विष्णु कृष्ण रूप में अवतार लेते हैं तो भगवान शिव उनके दर्शन करने कैलास पर्वत से उतर कर नंद गांव जाते हैं । भगवान के दर्शन करना चाहते हैं । ये एक लोक प्रिय प्रसंग है और हर प्रदेश में इसे  अलग अलग तरीके से गाया जाता  हिमाचल प्रदेश की गद्दी जनजाति भगवान शिव की अन्नय भक्त है उनके इष्ट महादेव हैं। भरमौर में भगवान शिव का एक परम धाम है जिसे भरमौर चौरासी कहते हैं।  मौसादा गायक भगवान शिव की अनेक कथाएं गाते हैं । दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निमंत्रण पर  जीवंत परंपरा में महाभारत के जय उत्सव में दिल्ली आए गद्दी गुराई रोशन और गुराइंन कंचन ने ये शिव स्तोतर ना केवल हमें गा कर सुनाया बल्कि उसका अर्थ भी समझाया। महाशिव रात्रि पर आप सबके लिए विशेष पोस्ट।
 भगवान शिव जब भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार के दर्शन करने जाते हैं तो मां यशोदा डर जाती है। भगवान शिव के कैलास पर्वत से धरती पर जाने की तैयारी से गायन आरंभ होता है। गद्दी इसे शिव स्तोतर कहते हैं--- 
 
मूल शिव स्तोतर (स्त्रोत )
 
1)   खड़ पर्वत से उतरे सदाशिव ,
 
 चले हिण   मातर लोकां ।
 नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
 चरण मां पाई चणण खड़ाऊं ,
 
 2)   लक में पहणा मृगाणा ।
       नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
 
3) गल्ल में झोली , मुंडे पहोड़ी,
    कान में कुंडल डाले हां जी 
    नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
 
4)   जटा जूट सर गंग लियो री 
     गल में नाग लिपटाए हां जी गल में नाग लिपटाए
      नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
    
 5) हुक्म कराया पार्वती ज्यों ,
     कर देना अमल प्याला ।
     आकड़ बम बम भोले जय शिव जय शिव हां हां जय शिव
      नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
         
 
6 )  नंदी बैल दी सवारियां सदाशिव
      चल हिण दर्शन पाणा ।
       नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
 
7 )  वारे थी मथुरा , वारे थी नंद द्वारा ,
       बीच में जमना बगोरे हां जी 
       नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
8)  गली गली शिव अलख जगाई,
     गली गली नादी बजाई   
   नरेणा हो ओ ओ हां जी --------   
   हेरि  बाई हेरि  बाई मात जशोदा 
      इत कोई साधु आया  
           नरेणा हो ओ ओ हां जी --------  
   तां बड़ी डरी सों मात जशोदा ,
     बालक रैण नी देणा --- 
 
      नरेणा हो ओ ओ हां जी 
 
      सत खोड़ी परोली सत खुड़ दे दरवाजे ,
 
      सतां ओबरी बालक छुपाया चढ़ गया सो त्रिशूला ।।
 
      नरेणा हो ओ ओ हां जी
 
     थाल भरे हीरे लाले ,
    थाल भरे गज मोती ,
 
यशोदा --      ले साधुआ तीजो भिछिया दिल्ली
 
     झोली जो तेरी दिल्ली भराई 
     
       नरेणा हो हो हां जी -----------------
 
 शिव ----      क्या करना इनां हीरा मोती ,
      
       क्या करना गज मोती
 
     अलख माया मेरी झोली भरो री
   
      सुण मेरी मात जशोदा
 
      नरेणा हो ओ --ओ हां जी
 
      दर्शन पाने को आया जशोदा ,
    
       बालक क्यों छुपाया ।
  
       नरेणा हो ओ ओ हां जी ---------
 
       तां बड़ी डरी  सो मात जशोदा
 
       बालक रैहण नी देणा
 
     नरेणा हो ओ ओ हां जी
 
     हीरे लाल छन्न कराई ,
 
    तेरा  आंगन गया भराईं ।
   
    नरेणा हो ओ ओ हां जी
 
    सुन्ण मान होई मात जशोदा
    
   ऐ बोलण करमाती , ऐ बोलण अविनाशी
 
   नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
 
यशोदा ---       कामन देश का रहने वाला,
 
                       क्या हिण नाम तुम्हारा  ।
                  
                      नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
 
शिव ---         जीवणु से भंग होया मैं ,
 
                     नाम मेरा शिव भोल्ला ।
 
                      नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
 
                  दर्शन पाण को आया जशोदा ,
               
                  बालक क्यों छुपाया ।
                
                 नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
 
                कच्छ मच्छ जब रूप्पै लिया अवतारा ,
                     
                तभी मैं दर्शन पाए जशोदा
              
                 नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
 
                 बामन रूप लिया अवतारा ,
 
                तब मैं दर्शन पाए जोशादा ।
           
               नरेणा हो ओ ओ हां जी --------
 
               नरसिंह रूप लिया अवतारा ,
 
                तब मैं दर्शन पाए जशोदा ।
 
                  नरेणा हो ओ ओ हां जी -------
 
                परशु राम लिया अवतारा ,
   
                तब मैं दर्शन पाए जशोदा ।
                   
                   नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
 
                  राम रूप जब लियो अवतारा ,
 
                   तब मैं दर्शन पाए जशोदा ।
                 
                   नरेणा हो ओ ओ हां जी ---------
                 
                  कृष्ण रूप जब लिया अवतारा,
 
                   तां क्यों लगी छुपाना जशोदा हां
 
                   नरेणा हो ओ ओ हां जी ---------
 
                 इतनी बात जै  बोले सदा शिव
 
                 खुल गए सब त्रिशूला हे हे
                
                 नरेणा हो ओ ओ हां जी ---------
 
                  अपने आप खुड़ी परोली ,
                  
                      बालक बाहर जै आया
                       
                          नरेणा हो ओ ओ हां जी -----------
                   
                         गोद करी मेरे अंतरजामी ,
 
                         बालक गोदां ज्यों आया
 
                          नरेणा हो ओ ओ हां जी -----
 
                         तां बड़ी डरी मात जशोदा ,
                            
                         बालक रहणा नी देणा ।
 
                         नरेणा हो ओ ओ हां जी ------
                
                          बालका जै मेरा नाग खाल्ला,
 
                           पर फेर जन्म  मा होणा ।
                        
                             नरेणा हो ओ ओ हां जी
 
      बालक कृष्ण  -- उठ साधुआ तुम्ही कर विश्रामा
                        
                               जा अपने कैलासा ,
                                
                               मातु जशोदा दा कहणा ना मोड़ ,
                          
                              बर श्राप देल्ली  हे हे ,
                                 नरेणा हो ओ ओ हां जी -------------
 
                                     मथुरा गांव में थिंजड़ी होल्ली
    
                                      उस जगह दर्शन देल्ली हे हे
 
                                           नरेणा हो ओ ओ हां जी
 
                                            सुण दे लोक दा भला कराया ,
 
                                               सुणा सदाशिव स्वामिया
                                            
                                                    नरेणा हो ओ ओ हां जी
  गद्दी शिव स्तोतर   ( गद्दी ऐसे ही उच्चारण करते हैं )  सरल अर्थ
  धरती पर भगवान विष्णु ने कृषणावतार लिया है और भोलेनाथ उनके दर्शन करने जा रहे हैं । भगवान शिव कैलास पर्वत से उतर कर अब मृत्यु लोक जा रहे हैं , पांवों में चंदन की खड़ाऊं पहन ली , कमर में मृग की खाल पहन ली ।
 
      हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी -----------
     
   गले में झोली डाल ली , कंधे पर साधुओं वाली छड़ी रख ली ,
 
        कानों में कुंडल पहन लिए हे हे हां जी ---------
 
         हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
 
        बालों का जटा जूट बना हुआ है , सर पर गंगा जी है ,
       गले में नाग लिपटाए हुए हैं हे हे हांजी
      
 हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
 पार्वती को हुक्म दिया कि अमल ( भांग ) प्याला बना दो ,
 भोले मे भांग चढ़ाई और मस्त हो कर बोले -- बम ,बम
 
         जय शिव ,जय शिव हां हां जय शिव ----
          हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
        नंदी बैल पर बैठ कर उसे पुचकारा और निकल पड़े दर्शन को,
 
               हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
    
             भोले धरती पर पहुंचे ,सुंदर यमुना जी बह रही थी ,
 
             यमुना के एक किनारे पर मथुरा और दूसरे किनारे नंदगांव
 
                 हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
 
              अब भोले नाथ नंद गांव पहुंच गए हैं आगे देखिए क्या होता है ----
 
             शिवजी ने गली गली में अलख निरंजन की पुकार लगायी ,
 
             गली गली में अपना डमरू बजाया
 
                   हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
 
         भोले नाथ की हुंकार सुन कर पूरे गांव में शोर मच गया कि कोई विकट साधु आया है । यशोदा माता को भी पता  चला कि कोई भंयकंर दिखने वाला गले में नाग लिपटाए साधु नंदगांव आया है
 
             यशोदा माता बार बार गली में देखने जाती है ,
 
             जिसका इतना शोर है कौन है वो साधु ।
 
            हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----------
  
             साधु का विकट रूप देख कर माता यशोदा डर गयीं
 
              मन ही मन सोचती हैं ये साधु मेरे बालक को ना ले जाए 
 
                 हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
             यशोदा माता ने सातों द्वार ,सभी खिड़कियां बंद कर दीं ,
 
                और बालक को सात कोठरियों के भी पीछे छुपा दिया
 
                 और सब जगह ताले लगा दिए हे हे
 
                  हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                 साधु आ कर माता यशोदा के द्वार पर खड़ा हो जाता है ,
 
                  और कहता है अपने बालक के दर्शन कराओं
 
                भयभीत  माता यशोदा हीरे मोती और गजमुक्ता के
                  
                    थाल भर कर लाती हैं कहती हैं ----
 
                     लाओ साधु अपनी झोली पसारो ,
      
                         मैं तुम्हारी झोली हीरे मोतियों की
                 
                          भिक्षा से भर दूंगी --- हे हे ----
 
                       हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                     अब भगवान शिव यशोदा को क्या जवाब देते हैं सुनिए -----
 
                      मुझे इन हीरे मोती और गज मोतियों का क्या करना है ,
 
                      सुनो मेरी   मात यशोदा मेरी झोली
 
                      अपने बेटे के दर्शन से भर दो हे हे ------
 
                           हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                        मात यशोदा मैं तेरे बालक के दर्शन करने आया हूं
                   
                           तूने बालक को क्यों छुपा दिया है -- हां जी हां हां ---
 
                         हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                        अब तो माता यशोदा का संदेह यकीन में बदल गया,
 
                        वो सोचती हैं ये साधु मेरे बच्चे को ले जाएगा हे , हे
 
                        हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                         भगवान शिव अंतर्यामी है  तीन लोक के स्वामी हैं
              
                            यशोदा के मन की बात जान रहे हैं लेकिन अपना रूप प्रकट नहीं    
                            
                              कर रहे हैं . अब वो क्या करते हैं सुनिए ---
 
                              यशोदा के हाथों में हीरे मोती गज मोती थाल हैं
                 
                                भगवान शिव मुठ्ठियां भर भर कर यशोदा के आंगन
 
                               में बिखेरते जाते हैं और कहते हैं ये तुम्हारे लाल पर न्यौछावर हैं  
 
                                हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                                अब तो यशोदा मैय्या सुन्न हो गयीं ,
                
                                 सोचती हैं ये कोई साधारण साधु नहीं है
   
                                  ये चमत्कारी , अविनाशी साधु है  ओ हे हे
 
                                   हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
   
                                   अब यशोदा मैय्या पूछती हैं ----
 
                                  हे साधु ! तुम कौन देश के रहने वाले हो ?
                       
                                  हे  साधु  ! तुम्हारा नाम क्या है ?
                               
                                   हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                         अब सुनिए भगवान शिव यशोदा को क्या जवाब देते हैं ---
 
                                मैं अपने जीवन से तंग हुआ
 
                                   शिव भोला साधु हूं --
 
                                    हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                                    मैं तेरे बालक के दर्शन करने आया हूं ,
                       
                                        तुमने अपने बालक को क्यों छुपा दिया है ?
 
                                       हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
      
                                     जब तेरे बेटे ने कच्छप अवतार लिया
 
                                     मात यशोदा मैनें दर्शन पाए,
                                  
                                    मत्सय अवतार लिया तब दर्शन पाए,
       
                                   वामनरूप , नरसिंह रूप के दर्शन पाए ,
 
                                    परशुराम , राम अवतार के दर्शन पाए
                              
                                    अब जब कृष्ण अवतार हुआ तो ,
 
                                        मां यशोदा तुम क्यों छुपा रही हो ।
                                        
                                       हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
                               
         यशोदा मैय्या जानती ही नहीं कि उसका बेटा भगवान है और ना ही ये जानती है
 
          कि सामने खड़ा साधु तीनों लोकों का नाथ है देवों का भी  देव  है   । वो अपने बेटे को इस विकट साधु की छाया से बी बचाना चाहती हैं । लेकिन सात तालों में बंद नवजात शिशु जानता है कि आदि देव महादेव उनके दर्शन करने आए हैं । अब भगवान विष्णु नहीं चाहते कि उनकी मां यशोदा ज्यादा  परेशान ना हो । अब आगे की कहानी सुनिए -------
 
                   जब शिवजी ने विष्णु अवतारों का वर्णन किया तो ,
                       
                      सारे ताले टूट गए , सारे दरवाज़े खुल गए ,
 
                       बालक कृष्ण बाहर आता है, शिव उसे गोद   ले  लेते हैं  ,
 
                      अंजान यशोदा मां और ज्यादा डर  जाती हैं .
 
                        सोचती हैं अब तो ये मेरे बच्चे को ले ही जाएगा
 
                            हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                           अगर साधु के नाग ने मेरे बच्चे को
 
                             डस लिया बस फिर तो ये जिवित नहीं रहेगा ,
                                 
                                 हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                                 हर की गोद में बालक बन कर हरि बैठे हैं,
           
            दोनों में मूक संवाद चल रहा हैं एक जगत का पालनहार है तो दूसरा कल्याण करने वाला तीनों लोकों का स्वामी है ,लेकिन यशोदा एक साधारण महिला है । एक आम ममतामयी मां है जो अपने बच्चों को अपनी जान से ज्यादा प्यार करती है । हरि और हर यशोदा मां के मन की दशा जानते हैं । अब विष्णु जी शंकर जी से मूक संवाद में क्या कहते हैं सुनिए --------
 
                         उठ साधु अब तू विश्राम कर यानि बस अब अपनी लीला समाप्त कर ,
                         अब तू अपने कैलास पर्वत को लौट जा ,मेरी मां यशोदा का कहना मान ,
                         वरना मात यशोदा कहीं तुम्हें श्राप ना दे दे -- हे हे
 
                            हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                            अब तुम कैलास जाओ , मैं तुम्हे मथुरा में दर्शन दूंगा
 
                           जब मैं अपने मामा कंस का वध करूंगा तब मेरे दर्शन करना ।
 
                             हां जी नारायण हो ओ ओ हां जी ----- 
 
                           जो भी भगवान शिव के इस स्तोतर को सुनेगा
          
                           उसका भला होगा , हे मेरे सदाशिव स्वामी उसका भला होगा ।